भुपेंद्र शर्मा, मुख्य संपादक , सिटी दर्पण, चंडीगढ़
बीते कुछ दशकों में प्लास्टिक ने हमारे जीवन को सुविधा से भर दिया है। यह हल्का, मजबूत, सस्ता और उपयोगी है। लेकिन आज यही प्लास्टिक हमारे पारिस्थितिक तंत्र के लिए संकट का कारण बन चुका है। इसकी अपघटन में लगने वाली सैकड़ों वर्षों की अवधि, इसके व्यापक उपयोग और असंगठित अपशिष्ट निपटान ने इसे वैश्विक आपदा का रूप दे दिया है। ऐसे में वैज्ञानिक समुदाय द्वारा प्रस्तुत की गई एक नयी आशा की किरण – बैक्टीरिया आधारित बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का निर्माण – इस संकट के समाधान की ओर एक साहसिक कदम है। आइये समझते हैं बैक्टीरिया की ताकत के बारे में।कोरिया के प्रतिष्ठित एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने ई. कोलाई बैक्टीरिया को जैव-इंजीनियरिंग द्वारा इस प्रकार परिवर्तित किया है कि वह ग्लूकोज जैसे सरल, पादप-आधारित पदार्थों से ऐसा प्लास्टिक उत्पादित कर सके जो मजबूत होने के साथ-साथ बायोडिग्रेडेबल भी हो। इस नवाचार की विशेषता यह है कि यह प्लास्टिक नायलॉन की मजबूती और पॉलिएस्टर जैसी विघटनशीलता दोनों को संयुक्त करता है। यह भविष्य में पारंपरिक प्लास्टिक का स्थान लेने में सक्षम हो सकता है। अब बात करते हैं प्लास्टिक रीसाइक्लिंग में विश्वस्तरीय खोज की। जैव-इंजीनियर्ड बायोप्लास्टिक- ई. कोलाई जैसे सूक्ष्मजीवों को बायोप्लास्टिक निर्माण के लिए इंजीनियर किया जा रहा है। जैसे केरल में आलू स्टार्च आधारित बोतलें विकसित की गई हैं, वैसे ही अन्य कई नवाचार चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर संकेत करते हैं। जापान में एक ऐसा बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक तैयार किया गया है जो समुद्री जल में घुल सकता है, जो समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित करने की दिशा में बड़ी सफलता है। निष्पक्ष व्यापार आधारित रीसाइक्लिंग मॉडल-"प्लास्टिक फॉर चेंज" जैसे सामाजिक उद्यम अनौपचारिक कचरा बीनने वालों को उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा देते हुए उन्हें रीसाइक्लिंग शृंखला में जोड़ते हैं। यह मॉडल पर्यावरणीय संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक समावेशन को भी बढ़ावा देता है। रासायनिक पुनर्चक्रण (केमिकल रीसाइक्लिंग)-इस तकनीक में प्लास्टिक को रासायनिक रूप से उसके मूल घटकों – मोनोमर्स – में तोड़ दिया जाता है। इससे निम्न गुणवत्ता और प्रदूषित प्लास्टिक को भी पुनः उपयोग के योग्य बनाया जा सकता है।पायरो वेव और कारबायोस जैसी कंपनियाँ इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी हैं। ए आई से आधारित कचरा छंटाई- कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग आधारित प्रणाली प्लास्टिक के विभिन्न प्रकारों को स्वतः पहचानकर छांट सकती है, जिससे रीसाइक्लिंग की गुणवत्ता और दक्षता में भारी वृद्धि हो सकती है। भारत में री साइकल और नेपरा जैसे स्टार्टअप इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। पाइरोलिसिस तकनीक के द्वारा प्लास्टिक को बिना ऑक्सीजन के अत्यधिक तापमान में गर्म करके ईंधन या औद्योगिक रसायनों में बदला जा सकता है। आई आई टी दिल्ली और गेल जैसे संस्थानों ने इसके सफल प्रयोग किए हैं। जमा वापसी प्रणाली- डी आर एस उपभोक्ताओं को प्रयुक्त प्लास्टिक वस्तुएँ लौटाने पर धनवापसी या अन्य लाभ प्रदान करता है।जर्मनी में यह प्रणाली 98% प्लास्टिक बोतलों के रीसाइक्लिंग में सक्षम रही है। प्लास्टिक सड़कें- भारत में 3 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कें प्लास्टिक-आधारित बाइंडर से बन चुकी हैं, जो टिकाऊ भी हैं और प्लास्टिक अपशिष्ट को उपयोग में भी लाती हैं। आइये बात करते हैं भारत में प्लास्टिक प्रबंधन की प्रमुख चुनौतियों के बारे में। यद्यपि आंकड़ों में 95% कचरा संग्रहण का दावा किया जाता है, लेकिन वास्तविकता में केवल 81% संग्रहण हो पाता है। इससे खुले में डंपिंग और प्रदूषण की समस्या बनी रहती है। कचरे को जलाना भारत में सामान्य चलन है, जिससे डाइऑक्सिन और फ्यूरान जैसे घातक रसायनों का उत्सर्जन होता है। यह वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट को जन्म देता है। वर्ष 2022 में सरकार ने कई सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया, परंतु किफायती विकल्पों की अनुपलब्धता के कारण यह प्रभावी नहीं हो पाया। छोटे उत्पादक इ पी आर के अंतर्गत उत्तरदायित्व से बच जाते हैं। ट्रैकिंग और निगरानी की कमी से यह नीति प्रभावहीन साबित हो रही है। कचरे के पृथक्करण और रीसाइक्लिंग हेतु आवश्यक एम आर एफ की भारी कमी है। इससे अधिकांश कचरा लैंडफिल में डाल दिया जाता है। माइक्रोप्लास्टिक हमारे जल, भोजन और मिट्टी में प्रवेश कर चुका है। यह समुद्री जीवन और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक, जूट और कपड़े के बैग जैसे विकल्प अभी महंगे और सीमित हैं। आर एंड डी में निवेश की कमी के कारण ये विकल्प बड़े पैमाने पर नहीं अपनाए जा सके हैं। भारत को इसके समाधान के लिए कई प्रयास करने चाहिएं जैसे विकेंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन, डिजिटल ट्रैकिंग के साथ सशक्त इ पी आर, अनौपचारिक क्षेत्र का औपचारिकीकरण, कड़े प्रतिबंध और वैकल्पिक पारिस्थितिकी, घरेलू स्रोत पृथक्करण को प्रोत्साहन, एम आर एफ अवसंरचना का विस्तार,स्थानीयकृत प्लास्टिक प्रबंधन योजना, इनोवेशन हब का निर्माण आदि हैं। अंत में कह सकते हैं कि प्लास्टिक संकट से निपटना केवल पर्यावरण की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए जिम्मेदार भविष्य की नींव रखने जैसा है। बैक्टीरिया द्वारा प्लास्टिक के जैव-अपघटन की संभावना विज्ञान की उस दिशा की ओर संकेत करती है, जहाँ समाधान प्रकृति के भीतर ही छुपा है।
भारत को विज्ञान, नीति, नवाचार और जनसहभागिता के समन्वय से इस चुनौती का समाधान निकालना होगा। समय की माँग है कि हम प्लास्टिक प्रदूषण को केवल समस्या के रूप में नहीं, बल्कि सतत विकास की दिशा में एक अवसर के रूप में देखें।