भारत और चीन के राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर, इन दोनों देशों के आपसी संबंधों का मूल्यांकन करना न केवल आवश्यक है बल्कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह द्विपक्षीय संबंध अत्यंत जटिल हैं और ऐतिहासिक, आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी मुद्दों से प्रभावित हैं। समय-समय पर टकराव और प्रतिस्पर्धा के बावजूद, दोनों राष्ट्र व्यापार, बहुपक्षवाद और सांस्कृतिक साझेदारी के माध्यम से जुड़े हुए हैं। चीन द्वारा दिए गए "एलीफैंट-ड्रैगन डुएट" के प्रतीकात्मक संदर्भ को देखते हुए, भारत और चीन को शांति, सहयोग और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों पर आधारित आपसी संबंधों को विकसित करने की आवश्यकता है। आइये समझते हैं भारत-चीन संबंधों के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के बारे में। भारत और चीन के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध 1950 में स्थापित हुए थे। पंचशील समझौता (1954) इन संबंधों की नींव बना, जिसमें शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांतों पर बल दिया गया था। प्रारंभिक वर्षों में दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध रहे, लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह संबंध तनावपूर्ण हो गए। इसके बाद दशकों तक आपसी अविश्वास बना रहा। 1988 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद, द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने की प्रक्रिया शुरू हुई। विभिन्न स्तरों पर वार्ताएँ आयोजित की गईं, जिनमें व्यापार, सुरक्षा और कूटनीति को लेकर कई महत्वपूर्ण समझौते हुए। 2024 के BRICS कज़ान शिखर सम्मेलन में भारत और चीन ने सहयोग को बढ़ाने का संकेत दिया। भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध बेहद गहरे हैं। 2023-24 में दोनों देशों के बीच व्यापारिक लेन-देन 118.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है, जबकि भारत को चीन के साथ बड़े व्यापार घाटे का सामना करना पड़ता है। भारत, चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्युटिकल कंपोनेंट्स, और मशीनरी का आयात करता है, जबकि लौह अयस्क, जैविक रसायन और अन्य कच्चे माल का निर्यात करता है। हालाँकि, चीन द्वारा दी जाने वाली सस्ती कीमतों के कारण भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा की चुनौती बनी रहती है। चीन का भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में भी बड़ा निवेश है। 2020 तक, चीन ने भारतीय स्टार्टअप्स में 3.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश किया था। हालाँकि, भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए चीनी निवेश पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं। भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत संबंध हजारों वर्षों पुराने हैं। बौद्ध धर्म के प्रचार में चीन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाह्यान ने भारत की यात्रा की थी और यहाँ की संस्कृति को अपने देश में पहुँचाया था।वर्तमान समय में भी, चीन में योग, आयुर्वेद और भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य की लोकप्रियता बढ़ रही है। दोनों देशों के बीच शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में भी सहयोग देखा जा रहा है। गर हम दोनों देशों भारत-चीन सुरक्षा और रणनीतिक संबंधों की बात करें तो भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा है, जो अभी तक स्पष्ट रूप से सीमांकित नहीं हुई है।चीन, अक्साई चीन क्षेत्र पर कब्जा जमाए हुए है और अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा मानता है।2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया।भारत, चीन द्वारा सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा निर्माण को संदेह की दृष्टि से देखता है।हालाँकि, मार्च 2025 में दोनों देशों के बीच 33वें कार्य तंत्र की बैठक हुई, जिसमें सीमा पर शांति बनाए रखने पर सहमति बनी। भारत और चीन विभिन्न बहुपक्षीय मंचों—ब्रिक्स, एस सी ओ, जी20, और ए आई आई बी—में सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं। हालाँकि, भारत ने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव बी आर आई का समर्थन नहीं किया है, क्योंकि इसका एक हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। भारत-चीन संबंधों में कई प्रमुख चुनौतियाँ भी हैं जैसे एल ए सी पर चीन द्वारा लगातार घुसपैठ और सैन्य तैनाती से तनाव बढ़ रहा है। गलवान घटना (2020) के बाद विश्वास बहाली एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 2023-24 में 85 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। चीन से महत्त्वपूर्ण औद्योगिक उत्पादों की अधिक निर्भरता चिंता का विषय बनी हुई है।चीन द्वारा पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता देने से भारत की सुरक्षा चिंताएँ बढ़ती हैं।चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भारत की संप्रभुता के लिए चुनौती बना हुआ है।चीन समर्थित साइबर समूहों द्वारा भारतीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले किए गए हैं। भारत ने सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए 300 से अधिक चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया है। चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र और सतलुज नदियों पर बनाए जा रहे बाँध भारत के जल संसाधनों के लिए खतरा हैं। भारत को चीन के साथ जल-सहयोग समझौतों पर ध्यान देना आवश्यक है। भारत-चीन संबंधों को सुधारने के लिए कई उपाय किये जा सकते हैं इनमें उच्च स्तरीय बैठकों और विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता को जारी रखना आवश्यक है।सीमा विवाद को हल करने के लिए निरंतर संवाद और सैन्य वार्ता आवश्यक हैं।भारत को "चाइना प्लस वन" रणनीति अपनाकर आपूर्ति श्रृंखला को विविधतापूर्ण बनाना चाहिए।आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना होगा। एल ए सी पर भारत को सैन्य बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करना होगा। साइबर सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए नए नीतिगत कदम उठाने होंगे।भारत को कुएड, एसिआन और बीमस्टैक जैसे मंचों पर अपनी भागीदारी को और मज़बूत करना होगा।वैश्विक स्तर पर भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए आर्थिक और रणनीतिक रूप से तैयार रहना होगा। अंत में कह सकते हैं कि भारत और चीन के संबंध द्विपक्षीय और वैश्विक राजनीति के महत्त्वपूर्ण कारक हैं। इन संबंधों में चुनौतीपूर्ण तत्व मौजूद हैं, लेकिन आपसी संवाद, रणनीतिक धैर्य, और आर्थिक एवं सांस्कृतिक सहयोग के माध्यम से इन चुनौतियों को कम किया जा सकता है। यदि दोनों देश शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और बहुपक्षीय सहयोग को प्राथमिकता दें, तो एशिया और संपूर्ण विश्व को स्थिरता और समृद्धि की ओर अग्रसर किया जा सकता है।