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संपादकीय

कहीं हम जाने अनजाने में दिव्यांगजनों को देश की डिजिटल समावेशन नीतियों से वंचित तो नहीं रख रहे

February 27, 2025 08:19 PM

 भुपेंद्र शर्मा, मुख्य संपादक , सिटी दर्पण, चंडीगढ़  

जी हां इस में कोई दो राय नहीं है कि जहां एक ओर पूरा देश वर्ष  2028 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था के रूप में उन्नति के सपने संजो रहा तो वहीं डिजिटल समावेशन नीतियों में दिव्यांग जनों  को उतनी तरजीह नहीं दी जा रही जितनी के वे वास्तव में हकदार हैं। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 और आई एस 17802 मानक (जो अभिगम-योग्यता आवश्यकताओं का एक सेट प्रदान करते हैं और यह निर्दिष्ट करते हैं कि कंटेंट को किस प्रकार सुलभ बनाया जाए) जैसे ढाँचों के बावजूद, दिव्यांग जनों को डिजिटल सेवाओं का लाभ उठाने में काफी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। या यूं कहें उन्हें इनके लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। हमारे देश में लगभग 70+ मिलियन दिव्यांग जनों के साथ, देश को न केवल बेहतर डिजिटलाइजेशन की आवश्यकता है, बल्कि उनकी सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये सभी क्षेत्रों में समग्र परिवर्तन की अत्यंत जरूरत है। भारत को एक ऐसे समाज के निर्माण के लिये अपनी रणनीतियों का तत्काल पुनर्मूल्यांकन करना होगा जहाँ दिव्यांग जन डिजिटल और वास्तविक दोनों जगहों पर गरिमा और स्वतंत्रता के साथ पूरी तरह से भाग ले सकें। आइये बात करते हैं भारत में दिव्यांग जनों से संबंधित प्रमुख प्रावधानों की। दिव्यांग जन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 दिव्यांगता को एक ऐसी स्थिति के रूप में परिभाषित करता है जो सामान्य कामकाज़ को प्रभावित करने वाली हानि (शारीरिक, मानसिक या संवेदी) का कारण बनती है। इनके लिए प्रमुख कानूनों में दिव्यांग जनों के अधिकार अधिनियम, 2016, भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992, राष्ट्रीय ट्रस्ट अधिनियम, 1999 और मानसिक स्वास्थ्य सेवा अधिनियम, 2017 शामिल हैं। दिव्यांगजनों के अधिकारों का समर्थन करने वाले अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की कार्य ढाँचे हैं जैसे दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (वर्ष 2006) जो समान अधिकार और गैर-भेदभाव सुनिश्चित करता है, सलामांका वक्तव्य (वर्ष 1994)– समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देता है, दिव्यांगजनों के एशियाई और प्रशांत उद्घोषणा (वर्ष 1992)– पूर्ण भागीदारी और समानता का समर्थन करती है। आइये समझते हैं कि भारत में दिव्यांगजनों से जुड़े कौन से प्रमुख मुद्दे हैं। इनमें डिजिटल अपवर्जन और सुगम्यता संबंधी बाधाएँ, रोज़गार और आर्थिक हाशियाकरण, स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक कल्याण योजनाओं में सीमित समावेशन, दिव्यांगजनों के लिये समावेशी शहरी नियोजन का अभाव, जलवायु परिवर्तन और आपदाओं का असंगत प्रभाव, अंतर-विभागीय हाशियाकरण, कानूनी पहचान और लाभ प्राप्त करने में प्रशासनिक बाधाएँ, सामाजिक कलंक और जागरूकता का अभाव आदि शामिल हैं। दिव्यांगजनों के समावेशन और सशक्तीकरण को बढ़ाने के लिये कई काम किये गये हैं इन में डिजिटल और तकनीकी सुगम्यता, दिव्यांगजन अधिकार कानूनों के कार्यान्वयन को सुदृढ़ बनाना, समावेशी रोज़गार और कार्यस्थल नीतियाँ, व्यापक स्वास्थ्य देखभाल और पुनर्वास सेवाएँ, सुगम्य शहरी नियोजन और परिवहन प्रणालियाँ, दिव्यांगजनों के लिये आपदा समुत्थानशीलन और जलवायु अनुकूलन, अंतर्विभागीय बाधाओं को दूर करना शामिल हैं। महिलाएँ, ग्रामीण दिव्यांगजन और जातिगत रूप से हाशिये पर होना: दिव्यांग महिलाओं के समक्ष आने वाली चुनौतियों का समाधान करने, सुरक्षित गतिशीलता, प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल की सुलभता और वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिये लिंग-संवेदनशील दिव्यांगता कार्यढाँचे का अंगीकरण किया जाना चाहिये। ग्रामीण दिव्यांगजनों को समुदाय आधारित डिजिटल साक्षरता केंद्रों और स्थानीय उद्यमिता पहलों के माध्यम से डिजिटल इंडिया एवं आजीविका कार्यक्रमों में एकीकृत किया जाना चाहिये। सहकर्मी नेटवर्क और सामुदायिक मार्गदर्शन के माध्यम से दिव्यांगजनों को सशक्त बनाने के लिये गाँव और ज़िला स्तर पर समर्पित सहायता समूह एवं स्वयं सहायता समूह बनाए जाने चाहिये। बेहतर नीतिगत समर्थन के लिये स्थानीय शासन संरचनाओं (जैसे ग्राम पंचायतों) में दिव्यांग प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिये। कानूनी पहचान और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच के लिये प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने में कल्याणकारी लाभों तक पहुँच में प्रशासनिक विलंब को कम करने के लिये विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र प्रणाली को स्वचालित आधार एकीकरण के साथ सुव्यवस्थित किया जाना चाहिये। सरकारी दस्तावेज़ प्राप्त करने में गतिशीलता संबंधी चुनौतियों का सामना करने वाले दिव्यांगजनों की सहायता के लिये उनके घर तक दिव्यांगता प्रमाणन सेवाएँ शुरू की जानी चाहिये। सभी दिव्यांगजनों से संबंधित कल्याणकारी योजनाएँ, रोज़गार के अवसर, स्वास्थ्य सेवाएँ एवं कानूनी सहायता एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने के लिये एकल खिड़की ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाया जाना चाहिये। ए आई-संचालित चैटबॉट सेवाओं को शामिल करने से कल्याणकारी योजनाओं की आवेदन प्रक्रिया अधिक उपयोगकर्त्ता-अनुकूल और सुलभ हो सकती है। सामाजिक धारणाओं में परिवर्तन और दिव्यांगता जागरूकता को बढ़ावा देने के तहत दिव्यांगता के प्रति जागरूकता के लिये एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया जाना चाहिये ताकि दिव्यांगता के प्रति रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती दी जा सके तथा समावेशी मानसिकता को बढ़ावा दिया जा सके। स्कूलों एवं विश्वविद्यालयों को स्वीकृति और सहानुभूति की प्रारंभिक संस्कृति बनाने के लिये दिव्यांगता जागरूकता मॉड्यूल को अपने पाठ्यक्रम में एकीकृत करना चाहिये। मुख्यधारा के मीडिया और मनोरंजन उद्योग को दिव्यांगजनों को सकारात्मक, गैर-रूढ़िवादी भूमिकाओं में दिखाने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, ताकि जनता की धारणा बदल सके। राष्ट्रीय पुरस्कारों और सार्वजनिक मान्यता के माध्यम से दिव्यांगजनों की उपलब्धियों (जैसे पैरालम्पिक खेलों के पदक विजेताओं) का जश्न मनाने से सामाजिक स्वीकृति एवं सशक्तीकरण को बढ़ावा मिल सकता है। बावजूद उक्त प्रयासों के अंततः हम कह सकते हैं कि 1 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था और व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की ओर भारत की यात्रा वास्तव में समावेशी होनी चाहिये, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि दिव्यांग जन पीछे न छूट जाएँ। इसके लिये एक आदर्श बदलाव— दिव्यांगता समावेशन को अनुपालन आवश्यकता के रूप में देखने से लेकर इसे राष्ट्रीय विकास की आधारशिला बनाने तक, की आवश्यकता है। प्रत्येक स्तर पर समावेशिता को शामिल करके, भारत एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकता है जहाँ दिव्यांग लोग समाज के सभी पहलुओं में सम्मान, स्वतंत्रता एवं समान अवसर के साथ भाग ले सकें।

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