PGI Report (March Month) नई तकनीक से बचाई जान, पहले बैलून से कैल्शियम तोड़ा, फिर स्टेंट डाल खोली ब्लॉकेज

Share this News:


नई तकनीक से बचाई जान, पहले बैलून से कैल्शियम तोड़ा, फिर स्टेंट डाल खोली ब्लॉकेज

नई तकनीक से बचाई जान, पहले बैलून से कैल्शियम तोड़ा, फिर स्टेंट डाल खोली ब्लॉकेज
चंडीगढ़ पीजीआई के कार्डियोलाजी विभाग ने पहली बार नई तकनीक का इस्तेमाल कर 52 वर्षीय एक व्यक्ति की बंद धमनियों (ब्लॉकेज आॅर्टरीज) का इलाज किया है। यह केस इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पीजीआई ने पहली बार इंट्रावेस्कुलर शॉक वेव लिथोट्रिप्सी विधि का इस्तेमाल किया है।
इसके तहत आॅर्टरीज में बैलून डालकर मजबूती से जमे कैल्शियम को तोड़ गया और फिर स्टेंट डालकर उसकी ब्लॉकेज खोली गई। इस विधि का उत्तर भारत में पहली बार प्रयोग किया गया है। इसे सफलतापूर्वक अंजाम देने में कार्डियोलाजी के विभागाध्यक्ष प्रो. डा. यशपाल शर्मा और डा. प्रशांत पांडा ने अहम भूमिका निभाई है।
डा. पांडा के मुताबिक, कैल्शियम इतना ज्यादा जमा था कि न तो स्टेंट डाला जा सकता था और न ही बायपास सर्जरी। दूसरी तरफ मरीज की हालत दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही थी। उनके मुताबिक इस नए प्रोसीजर में पहले हृदय की धमनी में बैलून डाला गया।
बैलून ने अंदर जाकर एनर्जी रिलीज किया है, जिससे कैल्शियम टूट गया। उसके बाद स्टेंट डालकर आगे की कार्रवाई की गई। पीजीआई कार्डियोलाजी डिपार्टमेंट के एचओडी प्रो. यशपाल शर्मा ने बताया कि उनका डिपार्टमेंट पहले भी कई उपलब्धियां हासिल कर चुका है।
एक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम, कार्डियोजेनिक शॉक और हार्ट फेलेयर के रोगियों में मृत्यु दर को बेहद कम करने में सफलता हासिल की है। उनके मुताबिक, जो पद्धति इस्तेमाल की गई है, वह उन मरीजों में बहुत सहायक होंगी, जो सर्जिकल या पारंपरिक उपचार के योग्य नहीं है।
बच्चों के दूध के दांतों को सड़ने से बचाना है, तो मां-बाप ये तरीका अपनाएं, निश्चित ही फायदा होगा
बच्चों के दूध को दांतों को सड़ने से बचाना है तो मां-बाप ये तरीका अपना सकते हैं। यह बेहद कारगर है और इससे निश्चित ही फायदा होगा। पीजीआई ओरल हेल्थ साइंस सेंटर अपने स्थापना की 25वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस अवसर पर एलटी कॉम्प्लेक्स में आयोजित रजत जयंती समारोह में सेंटर की 25 वर्षों की उपलब्धियां गिनाई गईं। कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्य प्रो. विनोद पॉल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।बच्चों के दूध के दांत को सड़ने से बचाने के लिए स्कूल हेल्थ प्रोग्राम में फिशर सीलेंट तकनीक को शामिल करने की तैयारी चल रही है। इसके लिए सरकार ने दो साल पहले पीजीआई चंडीगढ़ के ओरल हेल्थ साइंस सेंटर को यह जिम्मा दिया था। इसके तहत सेंटर ने चंडीगढ़ के पांच हजार स्कूली बच्चों के मोलर्स (दाढ़ के दांत) को फिशर सीलेंट से कवर किया था। अब उसके परिणाम का आंकलन भी शुरू कर दिया गया है।परिणाम में यह देखा जा रहा है कि इस तकनीक के प्रयोग से उन पांच हजार बच्चों में से कितनों के दांतों को सड़न से बचाया जा सका है। उसके बाद इसे देश भर में लागू किया जाएगा। पीजीआई ओरल हेल्थ साइंस सेंटर केएचओडी डॉ. के गाबा और पीडियाट्रिक डेंटिस्ट डॉ. आशिमा ने बताया कि बचपन में दांतों के सड़न की समस्या सबसे ज्यादा होती है, जबकि जरा सी सावधानी से उन दांतों को बचाया जा सकता है।योजना में 6 से 12 साल तक के बच्चों को शामिल किया गया है, जिनके दांतों की फिशर सीलेंट की गई है। मतलब, उनके दांतों को प्लास्टिक कोटिंग दी गई है और ऐसा करने से दांतों सड़ने से सुरक्षित किया जा सकता है। इससे दांतों की सड़न जैसी समस्या को 30 से 40 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। जल्दी ही परिणामों का आंकलन करके रिपोर्ट पेश की जाएगी।
क्या है फिशर सीलेंट
फिशर सीलेंट बच्चों के दांतों को सड़न से बचाने का एक सुरक्षित और दर्द रहित तरीका है। यह एक प्लास्टिक कोटिंग है, जो पीछे के वयस्क दांतों की चबाने वाली सतहों को कवर करती है। सीलेंट एक कठोर ढाल बनाता है, जो भोजन और बैक्टीरिया को दांतों में छोटे खांचे में जाने से बचाता है।
पीजीआई चंडीगढ़ में जमा कराया दो लाख का बिल, तब मिली मरीज को छुट्टी, जानिए क्या था मामला
पीजीआई एडवांस कार्डियक सेंटर में भर्ती यमुनानगर के 80 वर्षीय नरेंद्र कुमार मंगलवार को अस्पताल से छुट्टी कराकर घर चले गए। अपने परिवार के बीच पहुंचकर उनका कहना था कि अगर एक दिन और अस्पताल में रहना पड़ता तो शायद मैं नहीं बचता।
पिछले सोमवार को हार्ट की सर्जरी (एनीरीजम का इलाज) होने के बाद से भुगतान को लेकर चल रहे विवाद के कारण कार्डियक सेंटर से उन्हें डिस्चार्ज नहीं किया जा रहा था। इससे वे तनाव में थे। सर्जरी से पहले दो लाख और उसके बाद साढ़े चार लाख रुपये की मांग किए जाने से मरीज और उसके परिजन परेशान थे। एडवांस कार्डियक सेंटर के एचओडी डॉ. यशपाल के निर्देश पर मरीज के बेटे सुशील से सर्जरी के पहले तय किए गए खर्च का भुगतान कराया गया। सुशील ने बताया कि उसने मंगलवार की सुबह एक लाख 25 हजार रुपये पीजीआई में जमा कर दिए हैं। बाकी के 75 हजार रुपये वे तीन किस्तों में जमा करेंगे, जिसकी अनुमति पीजीआई ने उन्हें दी है। प्रकरण के बाद कार्डियक सेंटर में सर्जरी के बिल को लेकर लिखित प्रोफार्मा तैयार करने का भी निर्णय लिया गया है, जिससे भविष्य में बिल भुगतान को लेकर फिर कोई विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो पाए।
बिल भुगतान की प्रक्रिया पूरी कराकर मरीज को छुट्टी दे दी गई है। इस तरह की शिकायतों को दूर करने के लिए शीघ्र ही ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बहाल की जाएगी, जिससे इलाज के बाद भुगतान को लेकर कोई विवाद न उत्पन्न हो पाए।
– डॉ. यशपाल, एचओडी, एडवांस कार्डियक सेंटर, पीजीआई
लोकल रूट पर घाटे में सीटीयू, हरियाणा रोडवेज ने भी पीजीआई तक जाने से किया इंकार
हरियाणा रोडवेज की बसें अब चंडीगढ़ के लोकल रूट पर नहीं दौड़ेंगी। लोकल रूट पर सीटीयू के घाटे को देखने के बाद हरियाणा रोडवेज ने यह फैसला लिया है। एक बैठक के दौरान यूटी के ट्रांसपोर्ट सेक्रेटरी ने हरियाणा के अधिकारियों को बताया कि पीजीआई रूट पर सीटीयू की बसें घाटे में चल रही हैं, ऐसे में हरियाणा रोडवेज भी अगर बसें चलाएगा तो वह भी घाटे में ही रहेगा। हरियाणा रोडवेज ने पंचकूला के नारायणगढ़ से पीजीआई तक बस सर्विस शुरू करने के लिए पिछले साल अक्तूबर में सीटीयू को प्रस्ताव भेजा था।
इस पर चंडीगढ़ ने हामी भी भर दी थी लेकिन बीते दिनों हरियाणा के अधिकारियों के साथ हुई बैठक में ट्रांसपोर्ट सेक्रेटरी ने पीजीआई रूट पर सवारियों का आंकड़ा दिया। आंकड़ों के अनुसार, पीजीआई रूट पर सिर्फ 32 फीसदी ही सवारियां हैं। इस जानकारी के बाद हरियाणा ने खुद ही बसें चलाने से इंकार कर दिया। हरियाणा रोडवेज के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हरियाणा के विभिन्न जिलों से पिछले कई सालों से पीजीआई के लिए बस सर्विस शुरू करने की मांग की जा रही है, लेकिन यूटी होने की वजह से वह बसें नहीं चला सकते थे।
बता दें कि हरियाणा के विभिन्न हिस्सों से आने के बाद लोगों को कई बस बदलकर पीजीआई पहुंचना पड़ता है। पीजीआई पहुंचने वाले मरीजों को ऐसे में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। हरियाणा रोडवेज ने सिर्फ पंचकूला के विभिन्न हिस्सों को कवर करती हुई एक बस पीजीआई तक चलाने की मांग की थी। चंडीगढ़ का जवाब – आईटीएस से दूर हो जाएगी समस्या लोकल रूट पर बस सर्विस शुरू करने के प्रस्ताव पर सीटीयू ने पंचकूला से पीजीआई तक चलने वाली बसों का डाटा हरियाणा के अधिकारियों के साथ साझा किया। उन्होंने बताया है कि पंचकूला से पीजीआई तक सीटीयू की कई बसें चलती हैं। इनमें से ज्यादातर बसों की सीटें खाली ही रहती हैं।
यूटी के ट्रांसपोर्ट सेक्रेटरी अजय कुमार सिंगला ने कहा कि सीटीयू जल्द ही इंटेलीजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम (आईटीएस) अपनाने जा रहा है। इस पर काम चल रहा है। इसके पूरा होने के बाद लोग मोबाइल पर ओला-ऊबर की तरह ट्रैक कर सकेंगे। इससे सवारियों की संख्या बढ़ेगी। पंचकूला की सवारियों की समस्या का समाधान भी हो जाएगा।
हरियाणा रोडवेज ने क्यों भेजा था प्रस्ताव
नारायणगढ़ से पीजीआई के लिए कोई भी सीधी बस नही है। मरीजों को नारायणगढ़ से बस लेकर हाउसिंग बोर्ड उतरना पड़ता है। कई अनजान लोग पीजीआई जाने के लिए सेक्टर-17 पहुंचते हैं और फिर वहां से आॅटो या बस लेकर पीजीआई पहुंचते हैं। हरियाणा रोडवेज के प्रस्ताव के मुताबिक, वह पूरे पंचकूला को कवर करते हुए पीजीआई तक की बस सर्विस शुरू करना चाहते थे।
हरियाणा रोडवेज ने पीजीआई के लिए बस सर्विस शुरू करने का एक प्रस्ताव भेजा था। हमने इस रूट के ट्रैफिक की जानकारी उन्हें दी है। हरियाणा को बताया गया है कि लोकल रूट पर सवारियों की संख्या काफी कम है।
– अजय कुमार सिंगला, ट्रांसपोर्ट सेक्रेटरी, चंडीगढ़
पीजीआई का कमाल: देश के सबसे कम उम्र के नवजात ने किया अंगदान, व्यस्क को मिली किडनियां
बिना पंख के जैसे फरिश्ते… हां ऐसे ही थे कुछ रिश्ते… एक तीन दिन के नवजात ने दुनिया से जाते हुए किसी अजनबी को नया जीवन देकर इन चंद लाइनों को चरितार्थ कर दिखाया है। पीजीआई ने 68.3 घंटे के नवजात का अंगदान कराकर देश में सबसे कम उम्र के अंगदाता का अंगदान कराने का रिकार्ड अपने नाम कर लिया है।
पटियाला निवासी एक दंपती ने अपने कलेजे के टुकड़े के दुनिया से जाने के बाद भी उसे दुनिया में जिंदा रखने के लिए पीजीआई रोटो के स्टाफ से खुद जाकर अंगदान कराने के लिए पहल की। इसके बाद उस नवजात का पीजीआई में बुधवार की रात अंगदान कराया गया। उस नवजात के अंगदान से मिली दोनों किडनी को एक 21 वर्षीय महिला में प्रत्यारोपित किया गया है।
पीजीआई में 1996 से शुरू हुए अंगदान के इतिहास में ये नवजात सबसे कम उम्र का अंगदाता बन गया है। नवजात की किडनी को वयस्क को प्रत्यारोपित करने की प्रक्रिया बेहद जटिल थी। पीजीआई डायरेक्टर डॉ. जगतराम का कहना है कि उस नन्हे फरिश्ते ने दुनिया में चंद घंटों के जीवन के दौरान ही अपने जन्म की सार्थकता सिद्ध कर दी।
पीजीआई को उस फरिश्ते के माता-पिता पर बेहद गर्व है जिन्होंने अपने दु:ख को दरकिनार कर दूसरे के जीवन में खुशियां फैलाने का निर्णय लिया। इस कार्य में पीजीआई के डॉक्टरों के साथ ही पैरामेडिकल स्टाफ का कार्य भी तारीफ के काबिल है। उन्होंने एक जटिल प्रक्रिया को करने की हामी भरी और उसे सफलतापूर्वक करके दिखाया है।
पीजीआई रोटो के नोडल अधिकारी डॉ. विपिन कौशल ने बताया कि पटियाला के एक निजी अस्पताल में इस बच्चे का जन्म रविवार को हुआ था। रविवार को ही दंपती अपने बेटे को लेकर पीजीआई ट्रामा सेंटर पहुंचे। नवजात का ब्रेन ठीक तरीके से विकसित नहीं हो पाया था। बुधवार की सुबह डॉक्टरों ने उन्हें बता दिया कि बच्चे को बचाना मुश्किल है।
बुधवार को ही उस नवजात को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। इसकी जानकारी होने पर उस दंपती ने ट्रामा सेंटर में ड्यूटी कर रहे रोटो के कर्मचारियों से संपर्ककिया और अपने बच्चे के अंगदान कराने की इच्छा जताई। उनका कहना था कि वे इस सूचना को गुप्त रखना चाहते हैं। उनके निदेर्शानुसार उनके बच्चे का अंगदान कराया गया।
इससे पहले 11 माह के बच्चे का हुआ था अंगदान
तीन दिन के नवजात से पहले पीजीआई में 11 माह के नवजात का अंगदान कराए जाने का रिकार्ड था। वह बच्चा भी लड़का था। 2017 जुलाई में चंडीगढ़ के 11 माह के प्रीतम का पीजीआई में अंगदान कराया गया था। उसकी भी दोनों किडनी एक वयस्क को प्रत्यारोपित की गई थी।
आंखों में थे आंसू और नमन में झुके थे सिर
अंगदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उस नवजात की बॉडी को परिजनों को सौंप दिया गया। वापस लौटते वक्त एंबुलेंस के बाहर पीजीआई रोटो के साथ ही आॅर्गन ट्रांसप्लांट की टीम उस नन्हे फरिश्ते को नमन कर रही थी। उनकी आंखों में आंसू और उस नन्हे फरिश्ते के परिजनों को शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना साफ झलक रही थी।
ट्रांसप्लांट के लिए बच्चों के अंगों को पुनर्प्राप्त करना दुर्लभ है। ऐसे में अगर नवजात जन्मजात विसंगतियों वाला हो तो मामला और गंभीर होता है। ऐसे केस में अंगदान और अंग प्रत्यारोपण दोनों ही प्रक्रियाएं बेहद जटिल होती हैं, लेकिन पीजीआई के विशेषज्ञों की टीम ने पैरामेडिकल के साथ मिलकर इस चुनौती को स्वीकार किया और सफलता प्राप्त की।
– डॉ. आशीष शर्मा, एचओडी, रिनल ट्रांसप्लांट सर्जरी, पीजीआई
अंगदान करने या लेने से नहीं बदलती जिंदगी, 26 फरवरी को जरूर आएं पीजीआई
केस- 1: पंजाब के 30 वर्षीय गुरविंदर सिंह (बदला हुआ नाम) पीजीआई में 26 फरवरी को होने वाले ट्रांसप्लांट गेम 20-20 में बैडमिंटन, क्रिकेट और कैरमबोर्ड में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे। तीन साल पहले गुरविंदर का पीजीआई मेंकिडनी ट्रांसप्लांट हुआ था। वे ट्रांसप्लांट के बाद भी अपने पुराने शौक को बरकरार रखे हुए हैं।
केस- 2: शिमला की 45 वर्षीय सरोज (बदला हुआ नाम) भी इस गेम में रस्साकस्सी और 100 मीटर की दौड़ में हिस्सा लेंगी। सरोज ने चार साल पहले अपने भाई को अपनी एक किडनी दान दी थी। लेकिन उसके बाद भी इनके दैनिक जीवन में कोई बदलाव नहीं आया। फिटनेस को लेकर बेहद सजग रहने वाली सरोज की आज भी रस्साकस्सी जैसी फन गेम और दौड़ पहली पसंद हैं।
ये तो महज दो उदाहरण हैं, पीजीआई में 26 फरवरी को आयोजित होने वाले ट्रांसप्लांट गेम 20-20 में चंडीगढ़ समेत देश के विभिन्न शहरों से ऐसे 500 से ज्यादा प्रतिभागी भाग लेंगे, जिन्होंने जीते जी अंगदान किया है और जिनका पीजीआई में अंग प्रत्यारोपण हुआ है। इस आयोजन के माध्यम से अंग प्रत्यारोपण को लेकर लोगों के बीच फैले भ्रम को दूर किया जाएगा।
अंगदान करने और अंगा प्रत्यारोपण कराने के बाद भी जिंदगी सामान्य रूप से चल सकती है। बस जज्बा और सोच सकारात्मक होना जरूरी है। कार्यक्रम की तैयारियों में पीजीआई रोटो और आॅर्गन ट्रांसप्लांट विभाग पूरी तरह जुटा हुआ है। इसके उच्चाधिकारियों का कहना है कि ऐसे अवसरों के जरिए ही लोगों के मन में बैठी पुरानी अवधारणाओं को दूर किया जा सकता है।
इसके जरिए ट्रांसप्लांट कराने व आॅर्गन देने वाले लोगों के मन का डर भी काफी हद तक दूर होगा।
धीरे-धीरे बढ़ रही भागीदारी
आॅर्गन ट्रांसप्लांट के मरीज धीरे-धीरे इसे लेकर जागरूक हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रांसप्लांट के नाम पर पहले जितना डर दिखाई देता था वे कम हो रहा है। मरीज उसके बाद भी पहले वाली सामान्य जिंदगी जीने की सोच को सच साबित कर रहे हैं। इसके लिए हर दो साल पर आयोजित होने वाले ट्रांसप्लांट गेम में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस साल 500 से ज्यादा प्रतिभागी भाग लेंगे, जो पिछले सालों की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा संख्या है।
इन खेलों में लेंगे हिस्सा
26 फरवरी की सुबह पीजीआई के स्पोर्टर्स ग्राउंड में आयोजित ट्रांसप्लांट गेम 20-20 में बैडमिंटन, क्रिकेट, रिले रेस, पाथ वॉक, 100 मीटर की दौड़, साइकिलिंग, रस्साकस्सी और कैरमबोर्ड में प्रतिभागी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।
इन अंगों को कर सकते हैं दान
डॉक्टरों के मुताबिक मौत के बाद अंगदान करके एक व्यक्ति कम-से-कम आठ लोगों की जान बचा सकता है। ब्रेन डेड घोषित होने के बाद सभी अंग डोनेट किए जा सकते हैं। इसके लिए परिजनों की स्वीकृति लेना अनिवार्य है। ब्रेन डेड मरीज की किडनी, लीवर, फेफड़ा, पैनक्रियाज, छोटी आंत, वॉयस बॉक्स, हाथ, यूट्रस, ओवरी, फेस, आंखें, मिडिल ईयर बोन, स्किन, बोन, कार्टिलेज, तंतु, धमनी व शिराएं, कोर्निया, हार्ट वाल्व, नर्व्स, अंगुलियां और अंगुठे दान किए जा सकते हैं।
पीजीआई में अब तक इतने हुए अंगदान
1996 से 2020 फरवरी तक की रिपोर्ट
किडनी- 409
लिवर- 76
हृदय – 15
पैनक्रियाज- 24
फेफड़ा- 2
क८ार्निया- 7969
ट्रांसप्लांट गेम 20-20 के माध्यम से अंगदान को लेकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया जाएगा। जागरूकता अभियान से मौजूदा समय में लोगों की अवधारणा काफी तेजी से बदल रही है, लेकिन ऐसे आयोजनों का व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
– डॉ. अशोक कुमार, पीजीआई प्रवक्ता
कैसे हो इलाज, एक साल से बंद पड़ी पीजीआई चंडीगढ़ की कैंसर स्क्रीनिंग मोबाइल वैन, दान मिली थी
पीजीआई चंडीगढ़ में मरीजों के बेहतर इलाज के लिए हर साल करोड़ों के उपकरण खरीदे जा रहे हैं। उसका लाभ भी मिल रहा है, लेकिन पीजीआई के न्यू ओपीडी बिल्डिंग के पीछे एक साल से बंद पड़ी कैंसर स्क्रीनिंग मोबाइल वैन की ओर किसी का ध्यान नहीं है। इसके बंद होने से ब्रेस्ट कैंसर की जांच की निशुल्क सुविधा ठप हो गई है।
ब्रेस्ट कैंसर के जिन संभावित मरीजों की जांच तत्काल होनी चाहिए, उन्हें दो से ढाई महीने की डेट देनी पड़ रही है। कारण, पीजीआई के पास एकमात्र मेमोग्राफी मशीन का होना है, जबकि इस कैंसर स्क्रीनिंग मोबाइल वैन से क्षेत्र में जाकर महीने भर में हजारों महिलाओं के ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर के साथ ही आॅस्टियोपोरोसिस की जांच की जाती थी।
इस वैन को लेकर पीजीआई प्रशासन का रवैया भी लचर है। हैरानी की बात यह है कि एक साल में पता नहीं चल पाया है कि वैन में खराबी है या उपकरण में। पीजीआई का कहना है कि इस संबंध में पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, वैन मरम्मत करने की प्रक्रिया शीघ्र शुरू करने का आश्वासन दिया जा रहा है।
कहां से लाएं हजारों रुपये
पीजीआई रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट में मंगलवार को मेमोग्राफी जांच कराने आई जिन महिलाओं को दो महीने बाद की डेट मिली, उनके चेहरे उतर गए। माथा पकड़े वे बस एक ही बात कह रही थीं कि इस महंगाई में जांच के लिए अब दो हजार रुपये कहां से लाएं। पीजीआई में सस्ता इलाज की उम्मीद में आए थे।
डॉक्टर का कहना है कि 24 घंटे में जांच रिपोर्ट लाना जरूरी है, लेकिन यहां तो दो महीने से पहले सुनवाई नहीं होगी। वहीं, कुछ तो पीजीआई का कार्ड लेकर निजी सेंटर में जांच करवाने चली गईं। पीजीआई में मेमोग्राफी जांच शुल्क 200 रुपये है, जबकि निजी सेंटर इसके लिए दो से ढाई हजार रुपये ले रहे हैं।
चंडीगढ़ और पंजाब की महिलाओं को मिलनी थी खास सुविधा
ब्रेस्ट कैंसर के बढ़ते मामलों और इसकेडाइग्नोसिस की महंगी दर को ध्यान में रखते हुए फिलिप्स हेल्थकेयर ने 2012 में पीजीआई को यह खास वैन दी थी। इस वैन से चंडीगढ़ के साथ ही पंजाब और उसके आसपास केक्षेत्रों में जाकर महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर और आॅस्टियोपोरोसिस की निशुल्क जांच की जानी थी।
वैन में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और मैमोग्राफी जांच की अत्याधुनिक मशीनें लगाई गई थीं। योजना के तहत 2018 तक इसका संचालन ठीक तरीके से हुआ। हजारों महिलाओं को जांच के बाद पीजीआई रेफर किया गया। हफ्ते में दो दिन वैन क्षेत्र में जाती थी। बाकी दिन पीजीआई में इसकी सेवाएं ली जाती थीं, लेकिन पिछले एक साल से वैन बंद पड़ी है।
एक मशीन, कतार में हजारों
रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट में पुरानी मेमोग्राफी मशीन कंडम हो जाने केबाद अक्तूबर 2019 में नई डिजिटल ब्रेस्ट टोमोसिनथिसिस मेमोग्राफी मशीन लगाई गई है। उस एक मशीन से प्रतिदिन 30 से 40 जांच हो रही है। इसके बावजूद वहां मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा है कि दो महीने बाद ही डेट दी जा रही है।
एक दिन की देरी जिंदगी डाल सकती है खतरे में
रेडियोथेरेपी डिपार्टमेंट केएचओडी डॉ. राकेश कपूर के अनुसार ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण दिखते ही तत्काल जांच जरूरी है। इलाज में देरी मरीज की जिंदगी खतरे में डाल सकती है।कैंसर के इलाज में देरी खतरनाक साबित हो सकता है।
रेडियोलॉजी के एचओडी से बात की गई है, लेकिन वे बाहर हैं। जहां तक इसकेएक साल से खराब पड़े होने की बात है तो इसकी सूचना पीजीआई प्रशासन को देकर इसे ठीक कराने की प्रक्रिया शीघ्र शुरू कराई जाएगी।
– डॉ. अशोक कुमार, पीजीआई प्रवक्ता
पीजीआई के नेहरू अस्पताल में मरीजों की जान जोखिम में डाल चलाई जा रही कैंटीन
देशभर से मरीज इलाज के लिए पीजीआई चंडीगढ़ आ रहे हैं, लेकिन यहां उनकी जान जोखिम में डालकर इलाज हो रहा है। पीजीआई में संचालित कैंटीन में अनुमति के बिना एलपीजी का प्रयोग कर खाना बनाया जा रहा है। एक महीने पहले ही वहां की एक कैंटीन में खाना बनाते समय आग लगने की घटना हो चुकी है।
मामला पीजीआई नेहरू अस्पताल के चौथे तल पर संचालित कैंटीन का है, जहां अनुमति न होने के बावजूद खुलेआम भोजन बनाया जा रहा है। आग लगने के बावजूद पीजीआई प्रशासन गंभीर नहीं दिख रहा है।
कैंटीन के साथ किचन मिला उपहार में
पीजीआई प्रशासन ने चौथी मंजिल के कैंटीन के टेंडर में उसे सिर्फ कैंटीन संचालन की अनुमति दी है, जबकि वहां उसके बगल के एक कमरे को किचन बनाया गया है। जहां 24 घंटे पराठा, कड़ी-चावल, राजमा, पूड़ी, मटर-पनीर सहित अन्य सामान बनाए व बेचे जा रहे हैं।
कई शिकायतों के बावजूद नहीं हो रही कार्रवाई
वर्ष 2019 के रिकॉर्ड चेक करें तो कैंटीन से संबंधित शिकायत के मामले में कार्रवाई करते हुए कई प्वाइंट इंगित किए गए थे। 30 मई को हुई जांच में कमेटी ने पाया था कि वहां कैंटीन के नाम पर अवैध तरीके से एक कमरे पर भी कब्जा किया गया है।
इसके साथ ही वहां बिना अनुमति के काफी सामान बेचा जा रहा है। वहीं 10 जनवरी, 2010 को हुई जांच में भी कमेटी ने इन्हीं बिंदुओं पर आपत्ति जताई थी। कैंटीन में चाय-पकौड़ी के नाम पर वहां पिज्जा-बर्गर व मैगी बन रही है। बावजूद इसके प्रबंधन कोई कार्रवाई नहीं कर रहा।
कैंटीन के बगल में वार्ड और ओटी
नेहरू अस्पताल में मरीजों की जान से खिलवाड़ की यह स्थिति है कि आॅपरेशन थियेटर और सर्जिकल वार्ड के पास बनी कैंटीन के किचन में 24 घंटे खाना बनाया जा रहा है। इससे निकलने वाली गैस और धुआं मरीजों के लिए परेशानी का सबब बन रही है।
जनवरी में लगी थी आग
नेहरू अस्पताल की पांचवें तल पर संचालित डॉक्टर्स कैंटीन में 27 जनवरी को आग लगने की घटना हुई थी। उस घटना से पीजीआई प्रशासन चेतने के बजाय पल्ला झाड़ने का काम कर रहा है। पांचवें तल की कैंटीन को वैसे तो डॉक्टर्स कैंटीन का नाम दिया गया है, लेकिन वहां मरीज और उनके परिजन भी खरीदारी करने पहुंचते हैं।
टेंडर के अनुसार बेचना है यह सामान
चाय- 5 रुपये
दूध की चाय- 7 रुपये
समोसा- 10 रुपये
ब्रेड पकौड़ा- 10 रुपये
बर्गर- 10 रुपये
एक लीटर उबला दूध- आधा लीटर 25 रुपये में
नेहरू अस्पताल की चौथी मंजिल पर संचालित कैंटीन में मानकों के आधार पर काम हो रहा है। अगर टेंडर से विपरीत किचन संचालित हो रही है तो जांच कमेटी इसे तत्काल बंद कराएगी। जहां तक आग लगने पर बचाव की बात है तो इसके लिए पीजीआई पूरी तरह तैयार है।
– डॉ. अशोक कुमार, पीजीआई प्रवक्ता




Share this News:

Author

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *