Special Article 1 (April Month)-लोकतंत्र में जाति,धर्म, रिश्वतखोरी और परिवारवाद के चलते, डगमगाते इसके चारों स्तंभ, By Dr. Daler Singh Multani

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डा. दलेर  सिंह मुल्तानी, सिविल सर्जन(रिटायर्ड)   पंजाब

 

 

 

 

लोकतंत्र में जाति,धर्म, रिश्वतखोरी और परिवारवाद के चलते, डगमगाते इसके चारों स्तंभ

इस में कोई दो राय नहीं कि वर्ष 1947 में लंबी जद्दोजहद के बाद हमारा देश गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर आजÞाद होने में कामयाब हुआ और आजाद होते ही हमारे लोकतंत्र ने अपने चार मजबूत स्तंभों के सहारे आजादी मनाने का जो सपना लिया वह आज तलक पूरा नहीं हो पाया है। इस का मुख्य कारण लोकतंत्र के इन चार स्तभों पर टिकी लोकतंत्र की उस मजबूत इमारत की वह कच्ची छत्त है जो डालनी तो पक्की थी मगर जल्दबाजी के चक्कर में वह कच्ची ही डाल ली गई। इस का असर अब लोकतंत्र के मजबूत चारो स्तंभों पर भी दिखने लगा है। कई बार तो यह भी महसूस होता है कि उक्त हालातों के चलते ये चारों स्तंभ दिन ब दिन खोखले होते जा रहे हों।
यह सच है कि आजादी से पहले आम जनता गुलामी की जंजीरों के चलते थोड़ी घुटन महसूस किया करती थी मगर बावजूद इसके वह एक बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थी कि उसे न्याय यकीनन मिला करता था क्योंकि गुलामी के उस दौर में भी न्याय रूपी स्तंभ आज के मुकाबले ज्यादा मजबूत हुआ करता था। जबकि इसके विपरीत आज आजादी के बाद हमारे देश में लोकतंत्र प्रणाली के तहत अब के न्याय रूपी स्तंभ के अलावा तीन और मजबूत स्तंभ विधायका, कार्यापालिका और प्रेस मौजूद हैं परंतु फिर भी हमारे देश की जनता के चेहरों पर खुशी नदारद है। लोग ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
आज हमारी लोकतंत्र रूपी इस इमारत की कच्ची छत्त में जाति, धर्म, रिश्वतखोरी तथा परिवारवाद ठूसमठूस भरा नजर आता है। यही वजह है कि आज हम अपने लोकतंत्र के मजबूत चारों स्तंभों को डगमगाते हुए महसूस कर रहे हैं। लोग यह सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि उनके लिए लोकतंत्र अपनाना सही कदम था या फिर उन्हें इसके किसी और विकल्प पर तवज्जो देनी चाहिए थी। क्योंकि जनता आज लोकतंत्र में होते हुए भी लोकतंत्र सी आजादी महसूस नहीं कर पा रही है। जिस लोकतंत्र को अपने चार मजबूत स्तभों पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए वह स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहे हैं। आइये समझते हैं लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों को विस्तार से :-
लोकतंत्र के चार स्तंभों में विधानपालिका, कार्यापालिका, न्यायपालिका और मीडिया अथवा प्रेस को माना जाता है।
विधानपालिका से अभिप्राय उस सिस्टम से है जिसमें देश को चलाने के लिए जो नीतियां अथवा कानून बनाये जाते हैं, उन्हें उचित तरीके से राष्ट्रीय स्तर पर संसद में और राज्यों के स्तर पर विधान सभाओं में अंतिम रूप दिया जाता है। संसद में नीतियां अथवा कानून बनाने वाले वह लोग मौजूद रहते हैं जिन्हें पूरे देश की जनता अपने वोटों द्वारा चुन कर भेजती है। इन्हें सांसद अथवा एम.पी.कहा जाता है। संसद में दो सदन होते हैं एक लोक सभा और दूसरा राज्य सभा। संसद के एक सदन-लोक सभा में ये एम.पी., आम जनता द्वारा डाले जाने वाले वोटों से सीधे तौर पर चुन कर आते हैं जबकि संसद के दूसरे सदन राज्य सभा में एम.पी. का चयन राज्यों की विधान सभाओं में अप्रत्यक्ष रूप से एम.एल.ए.द्वारा किया जाता है। एम.एल.ए. अथवा विधायक उन्हें कहा जाता है जिनका चुनाव विभिन्न राज्यों में आम जनता सीधे तौर पर अपने राज्यों की विधान सभाओं के लिए करती है ताकि इन एम.एल.ए. के जरिये जनता अपने संबंधित राज्यों के लिए नीतियों अथवा कानून का गठन कर सके। इस विधानपालिका को लोकतंत्र का पहला स्तंभ कहा जाता है।
ठीक इसी प्रकार कार्यापालिका जिसे लोकतंत्र का दूसरा स्तंभ कहा जाता है, से अभिप्राय उस सिस्टम से है जिसका काम विधानपालिका द्वारा गठित नीतियों अथवा कानून को केंद्र और विभिन्न राज्यों के स्तर पर प्रशासनिक ढांचे द्वारा क्रियान्वयन करना यानि लागू करने का रहता है।
लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ में वह न्यायपालिका आती है जिसका मुख्य काम विधानपालिका द्वारा गठित नीतियों अथवा कानूनों को कार्यापालिका द्वारा पूरे देश में सही तरीके से लागू करवाने का रहता है। अगर कोई कार्यपालिका राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तर पर कोई कानून अथवा नीति को सही से लागू नहीं करती है तो न्यायपालिका राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा और राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय द्वारा और जिला स्तर पर जिला न्यायालय द्वारा स्वयं भी संज्ञान ले सकती है। इसके अलावा इसका काम देश की जनता को हर हाल में न्याय दिलाने का भी रहता है।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया यानि प्रेस माना जाता है जो पूरी तरह से विधानपालिका, कार्यापालिका और न्यायपालिका से स्वतंत्र होता है। इसका काम इन तीनों पर बखूबी नजर रखने का रहता है और यह इन तीनों और देश की जनता के बीच मजबूत पुल का भी काम करता है यानि देश की जनता की आवाज इन तीनों तक पहुंचाता है और इन तीनों की आवाज को आम जनता तक पहुंचाता है। इस से पूरा देश लोकतंत्र के ढांचें में सही से काम करता है और इसे ही लोकतंत्र में लोगों द्वारा, लोगों की और लोगों के लिए सरकार कहा जाता है।
अब हम समझते हैं कि हमारे देश के लोकतंत्र रूपी ढांचे में वास्तव में हो क्या रहा है क्यों हमें महसूस हो रहा है कि हमारे देश के लोकतंत्र के ये चारों स्तंभ डगमगा रहे हैं अर्थात खोखले हो रहे हैं।
अब मुश्किल यह आ रही है कि व्यवहारिक तौर पर आम जनता की वोटों से चुने जा रहे ज्यादातर नुमाइंदे जनता से धोखा कर रहे हैं। वे जाति, धर्म या फिर पैसे अथवा परिवार के रसूख से भोली भाली जनता के अमूल्य वोटों को अपने पक्ष में कर लेते हैं और इनके जरिए संसद अथवा विधान सभाओं की सदस्यता हासिल कर लेते हैं। इस प्रकार संसद अथवा विधान सभा में आम जनता का भला करने वाला नुमाइंदा नहीं बल्कि स्वार्थ, पक्षपात और किसी खास धर्म, जाति, क्षेत्र अथवा परिवारवाद से परिपूर्ण मुखिया पहुंच जाता है जिसे से देश अथवा राज्य के कल्याण के लिए नीतियों अथवा कानून की कम बल्कि अपने स्वार्थ की ज्यादा चिंता रहती है नतीजा देश और राज्यों में कल्याणकारी नीतियों उस प्रकार से नहीं बन पातीं, जिस प्रकार से आम जनता को इन की दरकार रहती है।
ठीक यही सब कार्यापालिका अथवा प्रबंधकीय ढांचे में भी हो रहा है। देश अथवा राज्य की कार्यपालिका अथवा सरकारें, कुछ भ्रष्ट नेताओं अथवा नुमाइंदों की वजह से उनके दबाव में वे सारी नीतियां लागू करती हैं जिससे किसी एक वर्ग, क्षेत्र, जाति, धर्म अथवा परिवार का भला होता हो। इस से कार्यपालिका वह काम नहीं करती जो कि उसे करना चाहिए। वह लोगों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह से खरी नहीं उतरती।
जहां तक न्यायपालिका की बात है तो इसके उतार चढ़ाव को हम हाल ही की कुछ घटनाओं में बखूबी देख चुके हैं आज न्यायापालिका में न्याय की मूर्ति माने जाने वाले जजों में कुछ जज सेवानिवृत्ति के बाद संसद का हिस्सा बन कर मलाई खाते नजर आ रहे हैं जिस पर व्यापक स्तर पर आलोचना भी हुई है। इतना ही नहीं पिछले लंबे अर्से से न्यायपालिक में आवश्यक पदों को भरा नहीं गया है इस से आम जनता को न्याय समय पर नहीं मिल पा रहा है केसों की पैंडेंसी बढ़ रही है और आम जनता ठगा सा महसूस कर रही है।
गर हम चौथे स्तंभ प्रेस अथवा मीडिया की बात करें तो इसे भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। प्रेस जिसे विधानपालिका, कार्यापालिका और न्यायपालिका की कारगुजारियों को उजागर करके लोगों की इच्छाओं तथा देश तरक्की का ख्याल रखना था आज पैसे तथा नेताओं की चाकरी कर लोकतंत्र का अपमान करता नजर आ रहा है। जनता इससे भी नराज है यही वजह है लोक प्रेस की बजाय आज सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं।
ऊपर लीखित सभी बातों पर विचार करते हुए इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि लोकतंत्र लोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के लिए महज़ कागजों में ही दर्ज है जब कि जाति, धर्म, पैसा तथा परिवारवाद आज के लोकतंत्र पर खासा भारी है जो कि लोकतंत्र के लिए बुहत बड़ा खतरा है। इसको सही पटरी पर लाने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है:-
-धर्म तथा राजनीति को बिलकुल अलग करो और जो व्यक्ति अथवा पार्टी इस से सहमत नहीं होती उस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाओ।
-किसी भी नेता पर लगे रिश्वत के आरोपों को चुनाव से पहले ही साबित करो या उसे इन से मुक्त करो ताकि केवल साफ छवि वाले नेता ही चुनाव लड़ सकें।
-चुनाव मेनिफेस्टो लीगल दस्तावेज होने चाहिएं, इनके प्रति नेता लोग जिम्मेवार होने चाहिएं, जो नेता निशुल्क सुविधाओं का ऐलान करके आम जनता को अपने पक्ष में कर लेते हैं और चुनाव जीत लेते हैं उन पर रोक लगानी आवश्यक है।
-किसी भी नेता को किसी भी पद के लिए दो बार चुनाव जीतने के बाद और चुनाव न लड़ने दिया जाये क्योंकि भारत नौजवान देश होना चाहिए, जो फैसले भी तुरंत ले और यहां हर किसी को नेता बनने का मौका मिलना चाहिए।
-सरकार का कार्याकाल पूरा होने पर तीन महीने पहले केंद्र में राष्ट्रपति शासन तथा राज्य में गवर्नर रूल होना चाहिए ताकि सत्तारूढ़ पार्टी को सरकारी तथा अन्य सुविधायें प्राप्त न हो सकें और वह भी अन्य दलों की तरह ही चुनाव में भाग ले सके।
-कार्यापालिका में मौजूद सभी अधिकारियों (प्रशासनिक तथा गैर प्रशासनिक) ने जिस कागज पर हस्ताक्षर किये हों उनको पूरी तरह उसका जिम्मेवार समझा जाये और समय आने पर उसमें की जाने वाली किसी भी गलती की सजा भी उन्हें दी जाये ताकि वे चाह कर भी कुछ गलत न कर सकें। आजकल तो अधिकारी अपने ज्यादातर फैसले मंत्री जी पर डाल देते हैं और कह देते हैं कि उक्त आदेश मंत्री जी ने किये हैं इस में हमारा क्या कसूर। दूसरी ओर मंत्री जी कहते हैं कि अधिकारी को नियमों का ख्याल रखना था मगर इस असमंजस में लोगों तथा कर्मचारियों का भयंकर नुकसान होता है, जिसकी भरपाई आजीवन नहीं हो पाती।
-न्याय के लिए समय सीमा तय होनी चाहिए और तय समय में न्याय न मिलने पर संबंधित अधिकारी विशेष की जिम्मेवारी तय की जानी चाहिए। जिसने जिम्मावारी के साथ ड्यूटी नहीं निभाई उसके लिए सजा का प्रावधान होना चाहिए। न्यायालय में यह कह कर मुद्दा छोड़ दिया जाता है कि दोज्Þा हू आर स्लीपिंग लैट दैम स्लीप, जबकि इस बात (दोज्Þा हू आर स्लीपिंग लैट दैम स्लीप) को ही पूरी तरह से छोड़ दिया जाना चाहिए और किसी एक मामले पर दिये गये आदेश उन सभी पर भी लागू माने जाने चाहिएं जो उसी मामले से हू ब हू संबंध रखते हों। भले ही अन्य कोई व्यक्ति अथवा संस्था उक्त संबंधित अपने मामले को लेकर न्यायालय गया हो या न गया हो। इस से न्यायालयों की बहुत सारी पैंडेंसी भी खत्म हो जायेगी।
-गलत तथा झूठ फैलाने पर मीडिया हाउसों अथवा कर्मियों को भी आड़े हाथों लिया जाना चाहिए और उन्हें उपयुक्त सजा दी जानी चाहिए। सोशल मीडिया पर मिथ्य प्रचार तथा पक्षपाती प्रचार के चलते पूर्णतय रोक लगनी चाहिए।

 

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Author

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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