Special Article 1 (December Month)-क्या वास्तव में प्रशासन संविधान नहीं बल्कि नेताओं के इशारों पर चलता है?, By Dr. Daler Singh Multani

Share this News:


डा. दलेर  सिंह मुल्तानी, सिविल सर्जन,पंजाब

 

क्या वास्तव में प्रशासन संविधान नहीं बल्कि नेताओं के इशारों पर चलता है?


जी हां, देश में मौजूदा हालातों के मद्देनजर तो यही प्रतीत होता है। आपको याद होगा कि हमारे देश के नागरिकों की लंबी जद्दोजहद तथा स्वतंत्रता सेनानियों की शहीदियों के बाद हमारा देश बड़ी मुश्किल से 1947 में आजाद हुआ इस आशा के साथ, कि अब देश की सत्ता किसी गैर के हाथ में नहीं बल्कि अपने लोगों के हाथों में होगी और हम स्वयं मिल कर यहां एक लोकराज्य का गठन करेंगे जिसमें देश के प्रत्येक नागरिक को यकीनन न्याय मिलेगा। इसकी पूर्ति के लिए देश के विद्वानों ने एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन कर लिखित संविधान भी तैयार किया जो कि 26 जनवरी 1950 को पूरे देश में लागू हो कर दिया गया। भारत देश पूर्णतय लोक राज्य बन गया। इस पूर्ण लोक राज्य की खूबसूरती और महत्ता को बरकरार रखने के लिए बतौर पहरेदार केंद्र में पार्लियामेंट (संसद) तथा राज्यों में इस प्रकार एक-एक असेंबली का गठन भी किया गया। केंद्र में संसद में दो सदन बनाये गये लोक सभा और राज्य सभा। लोक सभा के सदस्य का चयन सीधे तौर पर आम जनता द्वारा किया जाने लगा और इसी प्रकार राज्यों के स्तर पर विधान सभाओं में भी सदस्यों का चयन भी आम जनता द्वारा ही किया जाने लगा और राज्यों से चुने गये विधायकों के वोटों के जरिए संसद के दूसरे सदन राज्य सभा के सदस्यों का चयन भी किया जाने लगा जो आज भी बदस्तूर जारी है। देश के तत्कालीन संविधान निर्माता चाहते थे कि पूरे देश की जनता को बराबर का हक मिले और कोई इसमें पीछे न छूट जाये। संविधान के निर्माताओं ने लोक सभा और विधान सभा हल्कों से आम जनता के वोटों द्वारा चुन कर आये नुमाइंदों को कुर्सी पर बैठने से पहले इसी संविधान में एक शपथ दिलाने का खास प्रावधान जानबूझ कर रखा ताकि चुन कर आये नेता सत्ता को हासिल करे के बाद आम जनता के कल्याण के लिए किये जाने वाले कामों को करते समय किसी पक्षपात,अनुराग या द्वेष से दूर रहें और निष्पक्ष हो देश की जनता की पुरजोर सेवा करें, किसी पर कोई जुल्म न करें। क्या व्यवहारिक तौर पर हमारे देश में ऐसा ही हो रहा है, इसका उत्तर देने से पहले कृप्या आ लोग भारत के संविधान के मुताबिक जनता द्वारा चुने हुए सांसदों द्वारा ली जाने वाली शपथ के कुछ अंशों पर गौर फरमायें:-
ओथ आॅफ आॅफिस
मैं, (अमुक), ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के प्रधानमंत्री/मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंत:करण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।
ओथ आॅफ सीक्रेसी
मैं, (अमुक), ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि जो विषय संघ के मंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को, तब के सिवाय जबकि ऐसे मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक ् निर्वहन के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो, मैं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संसूचित या प्रकट नहीं करूँगा।
उक्त शपथ को पढ़ने के बाद ज्यादातर लोग इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे सांसद और विधायक चुने जाने के बाद और अपने सदनों की सदस्यता हासिल करते समय क्या शपथ लेते हैं और व्यवहारिक तौर पर वे क्या करते हैं। नेता लोग क्या करते हैं और किस प्रकार काम करते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। शायद हर कोई इसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भुग्तभोगी रहा है। कई संसद और विधान सभा के सदस्य अथवा मंत्री और उनके द्वारा किये जाने वाले काम, कानून के पवित्र ग्रंथ संविधान से भिन्न तो होते ही हैं साथ में यहां यह भी देखने में आया है कि इनमें से कई मंत्रियों अथवा सदस्यों ने तो स्कूल-कालेज का मुंह तलक नहीं देखा होता और वे देश अथवा राज्यों की जनता के कल्याण के लिए उन नीतियों का गठन करने लगते हैं जिनसे देश अथवा राज्यों का उत्थान होना होता है। उक्त नेताओं को संविधान के बारे में ज्ञान आम जनता से भी कम होता है, यही कारण है कि कई बार उक्त सदस्य संविधान को दरकिनार करते हुए अपनी मनमर्जी से फैसले लेने लगते हैं वे अपनी इच्छानुसार प्रबंधकीय आदेश देने लगते हैं। इसकी सबसे ज्यादा गाज गिरती है प्रशासनिक स्तर पर काम करने वाले सरकारी अधिकारियों अथवा कर्मचारियों पर, जो मजबूरी में न चाहते हुए भी उनके हर फरमान को लागू करने में तत्पर रहते हैं। नेता अपने निजी हितों व छोटे छोटे कामों के लिए अधिकारियों-कर्मचारियों पर अथाह दबाव डालते हैं अगर अधिकारी-कर्मचारी उक्त कामों को करने से मना कर दे तो उनके तबादले जानबूझ कर दूर दराज के इलाकों में करवा दिये जाते हैं ताकि सरकारी मेहनतकश, ईमानदार और जनता के कल्याण के लिए वचनबद्ध अधिकारी अथवा कर्मचारी के जीवन का पूरा ढांचा ही हिल जाये और उसका जीवन पूरी तरह से नरक बन जाये। वह सिवाय अपनी परेशानियों के और कुछ न सोच सके। यही वजह है कि उक्त अधिकारियों अथवा कर्मचारियों में से कुछ उक्त दर्दनाक हालातों और इन गैरजरूरी तबादलों के डर के चलते नेताओं के गैर कानूनी-असंविधानिक काम करने लगते हैं और वे भी मंत्रियों की चापलूसियों के जरिए अपनी कुर्सी बचाते हुए वक्त निकालने लगते हैं इस से देश लोक हित के बुनियादी मंत्र को कोसों पीछे छोड़ता जा रहा है।
अक्सर देखा गया है कि घर में कोई एक भी शख्स मंत्री अथवा एम एल ए या एम पी बन जाये तो पूरा खानदान उस पद का भरपूर फायदा उठाता है। या यूं कहें कि मंत्री के घर हर नुमाइंदा अथवा रिश्तेदार अपने मंत्रियों अथवा सदस्यों के पदों की शक्तियों का दुरोपयोग करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों अथवा कर्मचारियों पर इस प्रकार का दबाव डालते हैं कि जैसे संविधान उनकी निजी जागीर हो और हर कोई उनके मुताबिक काम करे न कि कानून के मुताबिक और तो ओर कानून की धाराएं तलक उनकी सोच पर आधारित हों। ऐसे मंत्रियों अथवा सदस्यों की गर किताबी शिक्षा को नजरंदाज भी कर दें तो उक्त नेता जाति, धर्म, पैसे के सहारे चुनावों में बार बार जीतते जाते हैं और फिर वही जाति, धर्म, पैसे की प्रथा को अपनी ताकत से संविधान का अपमान करने लगते हैं। कई बार यहां तक भी देखा गया है कि आम जिंदगी में भी उक्त मंत्री अथवा सदस्य अपनी झूठी शान के लिए उनकी सुरक्षा में लगाई हुई पुलिस व सुरक्षा कर्मियों के सहारे आम जनता से बदतमीजीयां और उन पर ज्यादतियां भी करते हैं। हमारे यहां एक कहावत मशहूर है कि जिस कोठी मे दाने उसके मूर्ख भी सयाने। मगर आज के दौर में जो वित्तीय हालत देश और राज्यों के बने हुए हैं वहां तो उक्त कहावत भी फिट नहीं बैठती। बावजूद इसके कुछ नेता अपनी मनमानी करते जा रहे हैं।
उक्त सभी बातों के बाद हमें निराश होने की जरूरत नहीं है। ऐसा नहीं है कि आज के प्रशासनिक ढांचे में हर कोई अधिकारी व कर्मचारी उक्त मंत्रियों अथवा एम.एल.ए. अथवा एम.पी.के आगे घुटने टेक रहा है और पूरी तरह से कुछ बेलगाम नेताओं को पूरी आजादी मिल गई है सब कुछ करने की। आज भी कई ऐसा जांबाज़ अधिकारी और कर्मचारी मौजूद हैं जो नेताओं द्वारा अपनी तशदद की परवाह किये बिना देश की जनता के कल्याण हेतु हर हाल में काम कर रहे हैं शायद देश आज भी उनके सिर पर ही टिका है और चल भी रहा है।

Share this News:

Author

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *