Special Article 1 (November Month)-ज़रा सोचो

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ज़रा सोचो

सिविल सर्जन और जाने माने समाज सेवक डॉ. दलेर सिंह मुल्तानी पिछले कई वर्षों से ज़रा सोचो शीर्षक के तहत सोशल मीडिया पर विभिन्न ज्वलंत मुद्दों को अपनी आसान भाषा में तथा सरल रचनाओं के ज़रिये आम जनता, नेताओं और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को जागरूक करने के लिए लगातार पहुंचा रहे हैं जिन्हें काफी पसंद किया जा रहा है, प्रस्तुत है उनमें से कुछ अंश:-
काम की महत्ता
काम ही पूजा, काम ही प्यार, काम ही सत्कार, काम ही जाति, काम ही गुमान, काम ही धमाका, काम ही नर्क और काम ही स्वर्ग।
स्वस्थ भारत
कूड़ा-करकट डस्टबिन में डालना पर्यावरण स्वच्छ बनाना।
हवा-पानी पेड़ हैं आपके मित्र, इन्हें अपनाओ सदा सुख पाओ।
आस पड़ोस जो रखे साफ सुखों का पाये बड़ा साथ।
जिसने सफाई से मन चुराया, उसने बीमारी स्वयं फैलाई।
मन और तन की साफ सफाई, हर एक के लिए खुशियां ले आयी।
मेरी दुनिया मेरा परिवार, साफ वातावरण सभी के साथ।
पानी डालना, कृषि करना, पेड़ हैं सब अपना सपना।
उठा ले कुदाल, अपने साथ, पर्यावरण को ले संभाल।
पेड़ लगाना सदा सुख पाना, पानी डाल कर इज्जत बढ़ाना।
पेड़ों की छांव में बैठा यार, याद करे जिसने लगाये हजार।
हवा तथा पानी हैं जीवन यार, पेड़ लगा कर इनको रखो तैयार।
डॉ. मुल्तानी की डेंगू से मुलाकात
मिस्टर डेंगू, लोगों का स्वस्थ खराब करके स्वस्थ विभाग को बदनाम करके जÞरा मीडिया, सिविल आॅफिसर को अपने बारे में बतलाओ।
मैं (डेंगू) उस साफ पानी में पलता हूं जो अमीर आदमी की रोज़ाना कारें धो कर, ए.सी., कूलर, फ्रिज, गमलों आदि के जरिये मुझे पनपने का माकूल अवसर प्रदान करते हैं।
पब्लिक हैल्थ वाले मुझे हर जगह इकट्ठा होने देते हैं, कभी किसी को जुर्माना नहीं करते और न ही स्प्रे, फोगिंग पर पैसे ज़ाया करते हैं।
सिवल आॅफिसर मुझे दबा नहीं सकते क्योंकि उन्हें मेरा पता ही नहीं मैं कौन हूं, आम मच्छर बताते हैं अकसर मुझे कि मैं टाइगर हूं आम नहीं।
मीडिया वाले मुझे आम बुखार से मिला कर लोगों को डराते हैं मगर मैं तो अमीरों का मलेरिया हूं तथा बहुत खास हूं।
दवा मेरे पर असर नहीं करती, बकरी का दूध मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकता है और ना ही कोई कीवी फल मुझे आंखें दिखा सकता है।
गर मेरे कहर से निजात चाहते हो तो फिर आस-पड़ोस में पानी इकट्ठा न होने दो यही तो मेरा घर है।
सफाई रखो, पानी भर पेट पिओ। आवश्यकता पड़ने पर डाक्टर से बात करो। यह जानकारी मैनें अपने बारे में स्वयं डाक्टरों को दे दी है।
सामाजिक शिक्षा
मां ठीक कहती थी सच्ची कहानी, जो पावर में है उसकी चलती है तथा यह सच है मगर ठीक नहीं। भारत के रखवाले भारत को खा रहे हैं इसमें कोई शक नहीं है।
ऊंचे पदों पर बैठे नेता तथा अधिकारी उनके लिए क्यों नहीं बोलते जो आपका गंद उठा रहे हैं या आपकी सोच के आधार पर नेताओं को स्टेजों पर बोलने के लिए दे रहे हैं स्पीचें तैयार करके, उनको तनख्वाह तथा सम्मान देते समय आपकी कलम की सियाही क्योंकर खत्म हो जाती है या आपकी ज़ुबां क्यों थथलाने लगती है।
मेरा मतलब सरकारी कर्मचारियों के ग्रुप सी तथा ग्रुप डी से है जिन्हें तनख्वाह देते समय आपकी समझदारी क्यों कंजूसी खा जाती है।
देश के रखवाले याद रखें संदेश पहुंचाने वालों को ज्यादा महत्ता दो बजाय कि जिसने संदेश दिया है।
मुझे याद है मेरी मां कहती थी जिसके हाथ संदेश भेजना उसको खुश करके भेजो ताकि वह संदेश सभी रिश्तेदारों में सही तथा प्यार से पहुंचाए।
नेता तथा अधिकारी सुनो अगर सरकारी कर्मचारियों के ग्रुप सी तथा डी खुश हैं तो सरकार सरहानीय है, अन्यथा सरकारों का संदेश सिर्फ डर के साथ पहुंचाया जायेगा जिसका असर बहुत कम होगा।
कृषि और खुराक
भारत कृषि आधारित देश है साठ से सत्तर प्रतिशत लोग कृषि पर आधारित काम करते हैं। शरीर का सारा तंत्र खाने-पीने पर निर्भर करता है तथा सभी को पता है खादों,कीट-नाशकों आदि का आवश्कता से अधिक प्रयोग, हो रही जो खाने वाले गेंहू, चावल, सब्जी, फल और दूध सभी को प्रभावित कर रहा है तथा कैंसर समेत और बहुत सारी बीमारियों का कारण है मगर बावजूद इसके हम आरोप किसी और के सिर पर थोप रहे हैं।
कृषि करने वाले भाईयो तथा बहनों होश करो और सोचो बीमारियां आप स्वयं फैला रहे हो मगर जिम्मेवार किसी और को ठहरा रहे हो। खाद कीट-नाशक कम करो तथा बीमारी रहत जीवन पाओ।
मुफ्तखोरी
हम भारतीयों को आदत है कि इस जन्म में दान करो अगले जन्म में सुख मिलेंगे। विदेश गये भारतीयों ने रोजाना पक्षियों को दाने डालने शुरु कर दिये। कुछ दिन तो यह सब एक गोरा देखता रहा। पक्षी आते दाना चुग कर वापिस चले जाते। एक दिन उसी गोरे से रहा न गया और हौंसला करके उसने पूछ ही लिया कि आप पक्षियों को दाना क्यों डाल रहे हो? भारतीय भाइयों ने जवाब दिया कि इन बेचारों का कौन सा आगे पीछे कोई है हम ही खाना देने वाले हैं दान किया है अगले जन्म में सुख देगा। गोरा हैरान हुआ उसने कहा कि शायद इन दानियों को नहीं पता कि कुदरत ने पक्षिों को इतने सख्त पंख दिये हैं कि वह भी हजारों मील उड़ने के लिए और ये अपना भोजन, मनोरंजन, रहने की जगह अपने आप ही ढूंढ ही लेते हैं। मगर उन्हें एक ही जगह बैठ कर बना बनाया भोजन मिलने लग पड़ा तो पक्षियों के आकाश में ऊंचा उड़ने की ताकत खत्म हो जायेगी तथा अगली पीढ़ी आकाश की ऊंचाइयां छूना छोड़ कर धरती पर रेंगने वाली नसल बन कर रह जायेगी।
दोस्तो सवाल कुछ इसी प्रकार का है भारत के राजनीतिक तथा धार्मिक नेताओं ने आरक्षण, फिर मुफ्त लंगर, छबीलों, मुफ्त की शगुन स्कीमों, मुफ्त के आटा दाल चावल, अगले जन्म के लिए दान पुन्य, धामर््िाक स्थानों में जमा सोना तथा पैसे से भारतीय जनता को इस प्रकार का अपंगु बना दिया है जैसे कि उड़ते पक्षी के पंख कुतर दिये हों तथा अब वे दाना चुगने के लिए भीख मांग रहे हों।
फैसला आपका है काम करके सोने की चिड़िया बन कर ऊं चे आकाश में उड़ना चाहते हो या फिर धरती पर रेंगते कीड़े बनना, जो चलते फिरते पैरों के नीचे आ ही जाते हैं।
बदलाव हमारा नारा है तथा काम हमारा धर्म है।

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Author

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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