स्वास्थ्य तथा शिक्षा सरकार की सामाजिक जिम्मेदारी, इसे आम जनता को पूर्णतय निशुल्क दिया जाना चाहिए 

डॉ दलेर सिंह मुल्तानी, एस.एम.ओ. एवं सलाहकार पी.सी.एम.एस.एसोसिएशन, पंजाबः पिछले लंबे अर्से से बीमारियों की मार झेल रहा हमारा देश,आज भी स्वास्थ्य के मद्देनजर पिछड़ा हुआ लगता है। भले ही केंद्र अथवा राज्य सरकारों की ओर से देश की जनता अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की कोशिशें की जा रही हैं मगर बावजूद इनके आज भी कई पहलुओं पर उक्त कोशिशें खरी उतरती नहीं नजर आ रही हैं। इन अधूरी स्वास्थ्य सेवाओं का सब से बड़ा कारण केंद्र अथवा राज्य सरकारों की ओर से स्वास्थ्य के लिए तय किये जाने वाले बजट में की कमी है। जो सरकारों की स्वास्थ्य के प्रति कम वफादारी दर्शाता है। इसके अलावा जिला तथा उपमंडल स्तर पर स्वास्थ्य विभाग का नियंत्रण ब्युरोक्रेट्स के पास चले जाने के कारण,बेवजह स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित कामों में अड़चने अक्सर देखने को मिलती हैं क्योंकि कथित ब्युरोक्रेट्स जो स्वास्थ्य विभागों का नियंत्रण तो अपने हाथों में रखते हैं मगर जमीनी स्तर पर इस स्वास्थ्य विभाग के बारे में कोई जानकारी नहीं रखते। इतना ही नहीं पंजाब तथा कई अन्य राज्यों में भी डिस्पेंसरियों के लिए एक अलग काडर बना दिया गया है जिसका चार्ज ए.डी.सी.डवेल्पमेंट को दिया गया है। अब आप ही अंदाजा लगा सकते हैं कि डिस्पेंसरियां इलाज के लिए होती हैं न कि डवेल्पमेंट के लिए। ऐसा में ए.डी.सी.डवेल्पमेंट इन डिस्पेंसरियों के तकनीकी पहलुओं पर क्या राय दे सकते हैं जिन्हें डाक्टरी क्षेत्र की ए बी सी तक नहीं बता होती। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होना तो दूर अलबत्ता स्वास्थ्य विभाग की सेवाओं में डाक्टरों की कमी अलग से महसूस हो रही है तथा साथ ही नेशनल प्रोग्रामों में भी तालमेल की कमी देखने को मिलती है। गर हम सरकारों की बात करें तो पिछले कुछ अर्से से सरकारों की ओर से स्वास्थ्य सेवाओं के प्राइवेटाइजेशन की कोशिशें और बड़े कार्पोरेट घरानों को निजी अस्पतालों के लिए उत्साहित करना किसी से छिपा नहीं हैं यह दोनों की काम आम जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में कमी लाने के लिए काफी हैं। स्वास्थ्य सेवाएं सरकार की सामाजिक जिम्मेदारी होती हैं तथा इन सेवाओं का पहला मकसद लोगों को अच्छी सेहत और बीमारियों से बचाना होना चाहिए। जिस के लिए फील्ड में काम कर रही संस्थाओं जैसे कि सब सेंटर, सबसिडरी हेल्थ सेंटर, मिन्नी प्राइमरी हेल्थ सेंटर, प्राइमरी हेल्थ सेंटर तथा कम्युनिटी हेल्थ सेंटर हैं। जहां स्टाफ को बहुत सारी मुश्किलों जैसे कि बिजली, पानी, सड़कों तथा इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी का सामना करना पड़ता है इस के अलावा बहुत सारी शारीरिक तथा मानसिक थकावट वाली मेहनत अलग से करनी पड़ती है। इतना ही नहीं उक्त स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे अधिकारी अथवा कर्मचारियों को न तो उचित वेतन मिलता है और न ही वे सुवधिाएं, जिनके के वे हकदार होते हैं। उल्टा दूसरी ओर बड़े अस्पतालों में वही काम करने वाले डाक्टरों तथा कर्मचारियों को सरकारी अस्पतालों के मुकाबवे बहुत सारी सुविधाएं तथा वेतनों में भी भारी वृद्धि मिलती है।
अब सवाल यह पैदा होता है कि सरकारें जिसकी आम जनता को स्वास्थ्य मुहैया कराना, पहली जिम्मेदारी बनती है ,वह बजाय कि आम जनता को बीमारियां लगने से पहले ही रोकथाम के कदम उठा कर बीमारियों से बचाने के, जानबूझकर क्यों चुप्पी साधे बैठी रहती हैं और जनता को बीमारियों का नवाला बनने देती हैं। जबकि वही सरकारें दूसरी ओर जानबूझ कर बड़े कार्पोरेट घरानों को निजी अस्पताल खोलने और उन्हें चलाने के उपयुक्त माहौल प्लेट में डाल कर परोस रही हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि लंबे समय से सरकारों की ओर से जानबूझकर उन सारी ऐसी योजनाओं को जन्म दिया जा रहा है जो अस्पतालों में दवाओं की कमी और अस्पतालों में काम कर रहे स्टाफ को कम सुविधाएं दिला सकें इससे ऐसा माहौल बन रहा है कि सरकारी अस्पतालों के कर्मी बजाय कि सरकारी अस्पतालों में टिकने के इन्हें तुरंत छोड़ प्राइवेट कार्पोरेट के अस्पतालों में जा कर काम करें। जो देश के लिए अच्छी बात नहीं है।
सरकारी अस्पतालों से निजी अस्पतालों की ओर डाक्टरों तथा स्टाफ के पलायन के कई कारण हैं जिनमें से मुख्य निम्न लिखित हैं:-
1. सरकारों ने निशुल्क दवाएं तथा सुविधाएं के बड़े बड़े नारे तो लगाये मगर उचित सुविधाएं नहीं दी, जिस कारण आम जनता तथा मरीजों का सरकारी अस्पतालों से विश्वास उठ गया।
2. दवाइयों पर नियंत्रण के बारे में सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से नहीं निभाने में नाकाम रही है। उल्टा सरकारों ने इस नाकामी का ठीकरा, सोशल तथा प्रिंट मीडिया आदि के जरिए डाक्टरों, स्वास्थ्य विभागों को बदनाम करके फोड़ा है जो सही नहीं है। यह शतप्रतिशत सच है कि दवाओं का नियंत्रण स्वास्थ्य विभाग के पास न होकर केमिकल तथा फर्टीलाइजर मंत्रालय के पास है और इसकी जिम्मेदारी तथा अकाउंटेबिल्टी भी इसी मंत्रालय की बनती है न कि मासूम डाक्टरों और स्वास्थ्य विभागों की।
3. इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी तथी फील्ड स्टाफ को कई हिस्सों में बांटा गया है जैसे कि डायरेक्टर हेल्थ सर्विसिस, हेल्थ कार्पोरेशन, एन.एच.एम.कांट्रेक्ट आदि में। स्वास्थ्य सेवाओं में विभिन्न तन्ख्वाह होना तथा अलग अलग अथॉरिटी होने के कारण यहां काम करने वाले डाक्टरों और स्टाफ में एकता की कमी आई है।
जिस प्रकार स्वास्थ्य सेवाएं सरकार की जिम्मेदारी है ठीक उसी प्रकार शिक्षा विभाग भी सरकार की सामाजिक जिम्मेदारी है। जिस में लगातार कमी आ रही है। सरकारी स्कूलों की जगह लोग प्राइवेट स्कूलों की पढ़ाई को ज्यादा पसंद करने लगे हैं क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकारी अस्पतालों की तरह सरकारी स्कूलों का इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले खासा कम है तथा सकारी स्कूलों में काम करने वाले अध्यापकों को स्कूलों में पढ़ाने के अलावा विभिन्न क्षेत्रों के अन्य काम अलग से दिये जाते हैं। जिससे स्कूलों की पढ़ाई में विघन पैदा होता है। गौरतलब है कि स्कूलों की ईमारतें बहुत पुरानी हो चुकी हैं साथ ही स्टाफ की कमी तथा पढ़ाई के माडर्न गजिटों की भी कमी है। इसके अलावा अध्यापकों के कई सारे वर्ग बना दिये गये हैं ताकि ये आपस में ही लड़ते रहें। इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है। जिसकी जिम्मेदार सरकार है।
सरकार को चाहिए कि अपनी सेहत तथा शिक्षा के बारे में सामाजिक जिम्मेदारी को समझे तथा लोगों तथा मुलाजिमों में फैले रोष को दूर करे। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र में जिसमें 60 से 65 प्रतिशत आबादी रहती है। इस क्षेत्र में सेवा निभा रहे स्टाफ को शहरों के मुकाबले ज्यादा सुविधाएं दे तथा स्टाफ को विभिन्न वर्गों में एक ही अथॉरिटी के तहत बरकरार रखा जाये ताकि स्टाफ में आपसी विरोध बंद हो जाये। सरकार सेहत तथा शिक्षा की सेवाओं का प्राइवेटाइजेशन रोक कर अपना फर्ज निभाये ताकि स्वास्थ्य तथा शिक्षा का मौलिक अधिकार जो लोगों का हक है को आसानी से स्थायी रूप से मुहैया कराया जा सके। और ये दोनों ही आम जनता को पूर्णतय निशुल्क दिया जाना चाहिए।

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cdadmin

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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