आज जरूरत है बेरोजगार नौजवानों को रोजगार मुहैया कराने की,न कि उन्हें टाल कर बहाने बनाने की

डॉ दलेर सिंह मुल्तानी, एस.एम.ओ. एवं सलाहकार पी.सी.एम.एस.एसोसिएशन, पंजाबः पंजाब सरकार हो या भारत सरकार, पिछले 71 वर्षों की आजादी के बाद से देश के नौजवानों को नौकरियां देने के सिवाय नारे लगाने के और कुछ करती नजर नहीं आ रहीं। गर हम जमीनी हकीकत पर गौर करें तो इन मासूम नौजवानों को जानबूझ कर नौकरियों से पूर्णतय वंचित रखा गया है। परिणामस्वरूप जहां नौजवानों ने नशों, गंदी आदतों तथा देश से विदेशों की ओर पलायन का रूख किया तो वहीं सरकारों ने भी अपनी विफलताओं का ठीकरा न केवल अन्यों पर फोड़ने का काम किया बल्कि अपनी कमजोर, खोखली व अव्यवहारिक नीतियों पर सोची समझी रणनीति के तहत पर्दा डालने की भरपूर कोशिश की।
उक्त नीतियों का विवरण इस प्रकार है:-
1. सरकारों द्वारा शिक्षा के लिए स्कूल तथा कालेज तो खोल दिये गये मगर इन्हें जॉब ओपिएंटिड नहीं बना पाये। नतीजा हर जगह शिक्षित लोग बेरोजगारी का दंश झेलने पर मजबूर होने लगे। याद रहे हमारा देश और इसका राज्य पंजाब दोनों ही कृषि बहुल क्षेत्रों के तहत गिने जाते हैं। या यूं कहें कि हमारे राज्य और देश दोनों में ही ज्यादा लोग कृषि पर आधारित हैं मगर हमारी केंद्र और राज्य सरकारों ने बजाय कि यहां कृषि पर आधारित उद्योगों को प्रमोट करने के अन्य उद्योगों की ओर तवज्जो दी नतीजा राज्य के लोग यहां पैदा की जाने वाली फसलों, उन्हें बोने की उचित तकनीक व आवश्यक उपकरण तथा कटाई के बाद उन फसलों के उचित रख-रखाव को ना तो कभी जान पाये और न ही समझ पाये। और तो ओर फसलों पर आधारित उद्योग न होने के कारण उन से बनने वाले खाने के उत्पाद तलक यहां तैयार नहीं हो पाये। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन नौजवानों का सीधा ताल्लुक पुश्तैनी खेती से था भी, वे भी इसे तिलांजलि दे शहरों का रुख करने लग गये। इस से उनके परिवार किसानों के रूप में कर्जे की मार झेलने को मजबूर हो गये। गर सरकार वास्तव में पंजाब के बेरोजगार नौजवानों को बेरोजगारी की गर्त से निकालना चाहती है तो उनके लिए कृषि आधारित उद्योग लगाने होंगे। उनमें फसलों से तैयार होने वाले उत्पादों पर जोर देना होगा ताकि युवा किसानों को उनकी मेहनत का अच्छा पैसा मिल सके और अन्य युवा भी इस व्यवसाय को बढ़ चढ़ कर अपनाएं।
2. ऐसा नहीं है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने नौजवानों को नौकरियां दी ही नहीं मगर इस में भी कोई दो राय नहीं है कि उक्त सरकारों ने मौजूदा हालात में सरकारी नौकरी में 58 वर्ष की रिटायरमेंट आयु के बाद सेवानिवृत्त कर्मचारियों अथवा अधिकारियों की नौकरी में जो एक्सटेंशन की अनुमति दी है इस अनुमति ने भावी पीढ़ी को दी जाने वाली संभावित नौकरियों पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। जबकि दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री और सूबे के मुख्यमंत्री इस बात से पूरी तरह से अवगत हैं कि भारत में आज 65 प्रतिशत से ज्यादा लोग 35 वर्ष की उम्र से कम उम्र के हैं तथा भारत को नौजवानों का देश भी माना जाता है मगर सरकार इन नौजवानों को समय के रहते आवश्यक नौकरियां न उपलब्ध करवा कर उनके हित्तों की अवेहलना कर रही हैं। जबकि दूसरी ओर उन बूढ़े हो चले कर्मचारियों अथवा अधिकारियों को अपनी वित्तीय मजबूरियां गिना कर, उनकी रिटायरमेंट होने का बावजूद उन्हें पुन: कांट्रेक्ट पर नौकरियों पर रख रही है।
3. इस एक्सटेंशन के तहत कथित री-रिक्रयुटमेंट में यह देखा गया है कि सरकारें अक्सर ज्यादातर विभागों में अपने चहेते आॅफिसरों को एडवाइजर-चेयरमैन-कमीशन के मैंबर तक लगा कर अपना पक्ष तो पूरा कर लेती हैं मगर पहले से काम कर रहे नौजवानों तथा योग्य आॅफिसरों को उक्त सेवाओं में नियुक्त करने से डरती ही नहीं बल्कि घबराती भी हैं, क्योंकि वे उक्त सरकारों में बैठे रहनुमा अधिकारियों के यस मैन साबित होने से गुरेज करते हैं।
याद रहे सरकारों की ओर से वरिष्ठ अधिकारियों की 58 वर्ष की रिटायरमेंट की आयु के बाद उन्हें एक्सटेंशन देने की नीति पर यकीनन पुन: विचार करना होगा अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पूरे सरकारी अमले में सिवाय फ्रस्ट्रेशन के और कुछ नहीं बचेगा जिसका सीधा असर रोजमर्रा के काम काज और फिर राज्यों व देश के विकास पर सीधे तौर पर पड़ेगा।
गर सरकारें चाहती हैं कि उक्त एक्सटेंशन वाली नीति को बरकरार रखा जाये तो यह नीति निम्नलिखित बातों के आधार पर बरकरार रखी जा सकती है:-
1. जिन अधिकारियों ने 58 वर्षों तक अपनी नौकरी के दौरान विशेष कार्य नहीं किया, उनसे 58 वर्षों के बाद कोई अन्य खास काम की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती। इस लिए इन्हें एक्सटेंशन के तहत नौकरी देना तो दूर नौकरी के पास तलक नहीं फटकने देना चाहिए।
2. यही फलस्फा राजनीति के उस जुमले के साथ बरकरार रहना चाहिए जिसमें अक्सर यह कहा जाता है कि गर आप 40 वर्ष की उम्र तक समाज सेवा कर नेता नहीं बन पाये तो 40 वर्षों के बाद नेता बन कर क्या कर लोगे। यानि जिन अधिकारियों का काम सुपरवाइजरी तथा प्लानिंग बनाना है, में गर लीडरशिप क्वालिटी की कमी पायी जाती है तो उन्हें ब्लॉक -तहसील, जिला, राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की सेवाओं की जिम्मेवारी देना सिवाय आत्मघाती कदम के और कुछ नहीं होगा वे देश अथवा राज्य में विकास की बजाय बर्बाद ही करेंगे। जो आज कई स्तरों पर महसूस हो रहा है।
3. चिकित्सा के क्षेत्र के माहिरों का कहना है कि आम तौर पर 40 वर्ष की उम्र के बाद व्यक्ति विशेष के शरीर के सैलों में नये सैल बनाने की ताकत कम हो जाती है जिससे शरीर सुस्त पड़ने लगता है, तथा कई अंगों की काम करने की ताकत भी कम हो जाती है। सरकार की ओर से अधिकारियों अथवा कर्मचारियों के सरकारी विभागों में काम करने की 58 वर्ष तक की उम्र सही उम्र है तथा इस उम्र के अधिकारियों को रिटायरमेंट उक्त अवधि के बाद सरकारी नीतियों के तहत ही नहीं बल्कि मेडिकली भी रिटायरमेंट ले लेनी चाहिए ताकि इनके बाद बेरोजगारी का दंश झेल रहे नौजवानों को भी नौकरी करने का मौका मिलेगा और वे पूरे जोश से काम करेंगे।
4. बोर्ड-कमीशन के एडवाइजरी वाले पदों पर रिटायर्ड कर्मचारियों को न लगा कर नौकरी कर रहे सरकारी मेधावी कर्मचारी तथा अधिकारीयों को ही लगाया जाये ताकि वे श्रेष्ठ योजना बना सकें और उसे लागू करवाने का मादा भी रखें।
अंतत: यहां यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि खाली दीमाग शैतान का घर होता है। जहां एक ओर देश तथा राज्य में धर्म-जाति की नफरत भरी राजनीति की जा रही है वहीं गर इसे रोक कर देश की जवानी को उचित काम की ओर लगा दिया जाये तो यह कदम अच्छा ही नहीं सर्वप्रशंसनीय भी होगा।

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cdadmin

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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