एक डाक्टर का फर्ज महज रोगी का इलाज करना ही नहीं, बल्कि उसके साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़ते हुए ,उसे समझना और उसकी हिम्मत बढ़ाना भी होता है: प्रो. भावना राय, रेडियोथैरेपी एंड ओंकोलोजी विभाग, पी.जी.आई.चंडीगढ़

डॉ. भुपेंद्र शर्मा, चंडीगढ़: एक डाक्टर का फर्ज महज रोगी का इलाज करना ही नहीं, बल्कि उसके साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़ते हुए ,उसे समझना और उसकी हिम्मत बढ़ाना भी होता है, ऐसा कहना है पी.जी.आई.चंडीगढ़ के रेडियोथैरेपी एंड ओंकोलोजी विभाग की प्रो. भावना राय जी का। उनका मानना है कि डाक्टर के चेहरे पर सदैव मुस्कुराहट और व्यवहार में नम्रता रहनी चाहिए, भले ही उसे मरीजों की भीड़ अथवा ज्यादा काम के चलते कितनी ही तनाव की स्थिती से गुजरना ही क्यों न पड़े। आप की हल्की सी मुस्कुराहट रोगी को उसका रोग भुला देती है और उसमें जीने की चाह बढ़ने लगती है, इस लिए डाक्टरों का रोगी के साथ हमेशा पर्सनल टच रखना खासा जरूरी रहता है। हम डाक्टरों को हर उस रोगी की इज्जत करनी चाहिए, जो आपके पास इलाज हेतु आया है। प्रो. भावना पी.जी.आई. चंडीगढ़ के रेडियोथैरेपी विभाग में एक सफल गाइनीकोलॉजिकल कैंसर विशेषज्ञ हैं। आपके पास महिलाओं के कैंसर वाले हर रोग से ग्रस्त रोगी इलाज के लिए आते हैं।
सिटी दर्पण से खास बातचीत में प्रो. भावना ने बताया कि पी.जी.आई. महज़ उत्तर भारत का ही नहीं बल्कि पूरे देश और विश्व का प्रतिष्ठित चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान है यहां काम करने वाले विशेषज्ञों अथवा कर्मियों को यह संस्थान जहां एक ओर आजीविका कमाने का मौका प्रदान करता है तो वहीं गरीब, रोग से परेशान मज़लूमों की सेवा के लिए अमूल्य अवसर पर मुहैया करवाता है। यहां वे रोगी इलाज के लिए आते हैं जो हर जगह से पूर्णतय हताश हो चुके होते हैं जीने की उम्मीद छोड़ चुके होते हैं। उन्होंने बताया कि जहां तक मेरा ताल्लुक है मैं यहां पी.जी.आई. में इलाज के लिए आने वाले हर रोगी को अपने परिवार की तरह लेती हूं और जितना हो सके उतना उनका सेवाभाव से इलाज करने की कोशिश भी करती हूं। ठीक होने पर रोगी के ललाट पर जो खुशी की लहर मैं महसूस करती हूं, वह सच में भुलाई नहीं जा सकती इससे बड़ी आत्मिक संतुष्टि और कहीं नहीं मिल सकती।
प्रो. भावना को 21 वर्षों से मेडिकल लाइन से जुड़ी हुई हैं। आपने वर्ष 1997 में लुधियाना के क्रिश्चियन मेडिकल कालेज से एम.बी.बी.एस.अच्छे अंकों से पास की। वर्ष 2000 में एम.डी.रेडिययोथैरेपी में इसी कालेज से ही पास की। वर्ष 2002 में पी.जी.आई. के रेडियोथैरेपी विभाग से डी.एन.बी. किया। आपने पी.जी.आई. में प्रोफेशनली पहला कदम वर्ष 2001 में बतौर सीनियर रेजिडेंट रखा। काम के प्रति लग्न, कड़ी मेहनत और ईमानदारी का जज्Þबा आपके संस्कारों में है। पी.जी.आई. में सीनियर रेजिडेंसी कंपलीट करने पर आपने वर्ष 2005 में अमृतसर के श्री गुरु राम दास इंस्टीच्यूटट आॅफ मेडिकल साइंसिस में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर ज्वाइन कर लिया अभी वहां चंद महीने ही बीते थे कि आपको इसी वर्ष 2005 में दिसंबर के महीने एक बार फिर पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ से बुलावा आ गया अब यह बुलावा पी.जी.आई. से नहीं बल्कि नव निर्मित गवर्नमेंट मेडिकल कालेज एवं अस्पताल सेक्टर 32 से था जिसे आपने सहर्ष चुनौती के तौर पर स्वीकार किया। यहां आपको सीनियर लेक्चरर काम करने का मौका मिला। यहां आपने चार साल डट कर रोगियों का इलाज किया और उनकी सेवा की। सितंबर 2009 में आपको पुन: पी.जी.आई. चंडीगढ़ ने असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए आमंत्रित किया चूंकि पी.जी.आई. वह संस्थान था जहां से आपने अपने करियर की शुरुआत की थी इस लिए आपने तुरंत संस्थान के रेडियोथैरेपी विभाग में ज्वाइन करना उचित समझा। इसके बाद काम में कड़ी मेहनत और रोगियों के प्रति अटूट श्रद्धा के मद्देनजर समय की धारा के साथ साथ पी.जी.आई. ने आपको असिस्टेंट प्रो.से वर्ष 2017 में प्रोफेसर के पद से नवाजा और आज आप इसी पद पर रोगियों की सेवा में समर्पित हैं।
गर हम प्रो. भावना राय जी के निजी जीवन की बात करें तो यूं तो आप पंजाब के लुधियाना से ताल्लुक रखती हैं और आपके जीवन की बुनियादी शिक्षा यहीं के सेकर्ड हार्ट कान्वेंट स्कूल से संपन्न हुई। इसके बाद आपने अपनी मेडिकल की पढ़ाई एम.बी.बी.एस. और फिर एम.डी.दोनों ही सी.एम.सी.से अच्छे अंकों से पूरे किया। आप बचपन से ही डाक्टर बनना चाहती थीं क्योंकि आपके पिता जी अपने जमाने के जाने माने न्युरोसर्जन रहे हैं। मगर कुदरत का करिश्मा देखो चूंकि आपके पिता जी स्वयं डाक्टर रहे हैं, अतैव वे आपको इस प्रोफेशन में नहीं बल्कि समाज सेवा के मद्देनजर एक सफल जर्नालिस्ट बनाना चाहते थे मगर हुआ वही जो तकदीर को मंजूर था। भगवान ने आपके मन की बात को ही लागू करवा दिया। जैसे ही आपने मेडिकल प्रोफेशन को करियर बनाने का फैसला लिया आपके पिता जी ने आपका सबसे ज्यादा साथ दिया। आप मेडिकल प्रोफेशन में अपने पिता जी को अपना रोल मॉडल मानती हैं।
करियर के शुरुआती दौर में मेडिकल प्रोफेशन ज्वाइन करते ही हालांकि प्रो. भावना का झुकाव मेडिसिन अथवा बाल रोग विशेषज्ञ बनने का था मगर किस्मत ने आपको सफल रेडिएशन ओंकोलोजिस्ट ही बनाना था। बावजूद इसके प्रो. भावना को न अपने प्रोफेशन चुनने पर कोई मलाल है और न ही उस विषय पर जिसमें आज आपकी महारत है। अलबत्ता आपको अपने काम पर गर्व है। प्रो. भावना कहती हैं कि पी.जी.आई. में बतौर डा. वे समाज के लिए वह सब कुछ कर पाईं जो शायद किसी और प्रोफेशन या संस्था में रह कर कभी नहीं कर पातीं। यहां मैने न केवल हर इंसान के वास्तविक दर्द को समझा व महसूस किया है बल्कि उसकी हर तरह से मदद करने की भी कोशिश की है भले ही यह मदद भावनात्मक हो या फिर क्लीनिकल हो। प्रो. भावना कहती हैं कि उनके पास जब रोगी इलाज के लिए आता है तो हर और से हताश हो कर ही आता है। वह न केवल गंभीर कैंसर के रोग के चलते अपने आपसे हार चुका होता है बल्कि कई बार तो उसके अपने भी इस समय उसका साथ छोड़ चुके होते हैं। अक्सर मध्यम दर्जे के रोगियों के पास इस इलाज के लिए पैसे की भी कमी पड़ जाती है ऐसे में एक ओर रोगियों का इलाज करना और दूसरी ओर भावनात्मक स्तर पर उनके आंसू पोंछना हमारा डाक्टरों का कर्तव्य नहीं तो और किसका है, सच में मुझे इसी में अत्यंत संतुष्टि का आभास होता है, ऐसा मानना है रहमदिल प्रो. भावना जी का।
प्रो. भावना जी से जब यह पूछा गया कि चूंकि कैंसर के रोगियों के पास आखिरी स्टेज होने के चलते, अक्सर कम समय रहता है ऐसे में बतौर डाक्टर वे कैसा महसूस करती हैं? प्रो. भावना एकाएक भावुक हो उठीं। उन्होंने बताया कि सच में शुरु शुरु में तो वे स्वयं रो दिया करती थीं। जैसे ही कई बार उन्हें इस बात का पता चलता था कि जिस रोगी से मैने सुबह बातें की हैं उसका दुख सुख पूछा है एकाएक गंभीर रोग के चलते शाम को वह इस दुनिया में ही नहीं है, मुझे खासी पीड़ा होती थी। प्रो. भावना कहती हैं कि इलाज के दौरान रोगी और डाक्टर के बीच एक अटूट संबंध बरकरार रहता है क्योंकि रोगी के लिए उसके जीवन की आखिरी उम्मीद सिर्फ और सिर्फ डाक्टर ही तो होते हैं। बावजूद इसके कई बार तो वे व्यक्तिगत तौर पर इस प्रकार से टूट जाती थी कि मरने वाला रोगी कोई और नहीं बल्कि मेरा अपना ही था। मैं हर रोगी को जो हमारे यहां इलाज करवाने के लिए आता है हमारे परिवार के सदस्य के तौर पर लेती हूं। मगर यह सब ईश्वर के हाथ में होता है हम डाक्टर आखिरी दम तक रोगियों का इलाज करके उन्हें स्वस्थ करने का भरपूर प्रयास करते हैं मगर कई बार ऐसा हो जाता है जो हमारे अपने हाथ में भी नहीं रहता। चूंकि मेडिकल प्रोफेशन के चलते हम डाक्टरों की भी सीमाएं होती हैं हम उसके आगे कुछ नहीं कर पाते। ऐसे में दीमाग और दिल का संतुलन बनाना बहुत आवश्यक होता है। एक ओर जिस रोगी को बचाने के लिए आप रात दिन एक किये होते हैं उसके साथ अप्रिय घटना घटती है, दूसरी ओर जो नये रोगी आपके पास इलाज के लिए आते हैं उनकी ओर तवज्जो देना, तीसरी ओर अपने प्रोफेशन पर गौर करना, चौथा आखिर में अपने परिवार की परवरिश करना सच में मुश्किल तो होता ही है मगर नामुमकिन नहीं। हम डाक्टरों को अपने प्रोफेशन और निजी जीवन का सांमजस्य बना कर चलना होता है। चूंकि प्रो. भावना के पति जी भी हृदय रोग विशेषज्ञ हैं, अतैव उनका राबता भी कई बार ऐसे गंभीर अवस्था में इलाज करवा रहे रोगियों के साथ होता है जो जीवन के आखिरी पल में उनसे इलाज करवाने आते हैं। ऐसे में उक्त हालातों में दोनों ही दंपत्ति डाक्टर एक दूसरे के साथ अपने अपने केसों को डिसकस कर अपने अपने मन को हल्का करने का प्रयास करते हैं ताकि अगले रोगी की वे शिद्दत से सेवा कर सकें। आप प्रोफेशन को अपने निजी जीवन में और निजी जीवन को प्रोफेशन में दखल कतई नहीं देना चाहते। अतैव हमारे लिए प्रोफेशन सर्वोपरि रहता है मगर परिवार की जिम्मेवारी भी तो हमारी ही है, कहते ही मुस्कुरा दीं प्रो. भावना।
प्रो. भावना ने बताया कि पिछले दो दशक के करीब मेडिकल प्रोफेशन में उन्होंने खासी मेहनत की है। उन्होंने बताया कि इस अवधि में उन्हें खासा कुछ सीखने को भी मिला है। प्रो. भावना ने बताया कि अपने काम में उन्होंने पी.जी.आई. के रेडियोथैरेपी विभाग में प्रो. फिरोजा पटेल जी से बहुत कुछ सीखा है वे कहती हैं कि गर उन्हें मेरी मेंटर कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। प्रो. भावना ने बताया कि उनके पास इलाज करवाने के लिए रोगी पंजाब के बठिंडा, लुधियाना, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, हरियाणा के अंबाला और तो जम्मू काशमीर तथा हिमाचल प्रदेश से भी आते हैं। हर सप्ताह उनके पास गाइनिकोलोजिकल कैंसर के 35-40 नये रोगी इलाज के लिए आते हैं जबकि एक सप्ताह में उनके पास पुराने रोगियों की संख्या 300-400 के करीब रहती है। उन्होंने बताया कि इसके उल्ट अन्य कैंसरों के नये रोगियों की संख्या 7 से 8 हजार प्रतिवर्ष है। जो ओ.पी.डी.में इलाज कराने आते हैं, दुख की बात यह है कि यह संख्या आये दिन बढ़ रही है। बजाय कि कम होने के। प्रो. भावना ने बताया कि उनके विभाग में उस हर नवीनतम तकनीक को रोगियों के इलाज में लाया जाता है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद है। वे रोगियों के इलाज में 25 करोड़ रु की कीमत वाली एफ. एफ.एफ.आईजीआरटी मशीन को भी प्रयोग में ला रहे हैं। इतना ही नहीं ट्राइयोलोजी मशीन का सीधा फायदा गरीब रोगियों को खासा होता है। उन्होंने बताया कि पी.जी.आई. में औसतन 350 रोगियों का इलाज रेडियोथैरेपी की मशीनों पर किया जाता है जबकि 70-80 रोगी रोजाना कीमोथैरेपी लेते हैं, जो सच में बड़ी बात है। फिलहाल रेडियोथैरेपी विभाग में कुल 13 फेकल्टी मौजूद हैं।
काम में महारत के चलते प्रो. भावना को समय समय पर विभिन्न सम्मानों से भी नवाजा जाता रहा है। नवंबर 2018 में इंडियन कालेज आॅफ रेडियेशन द्वारा आपको फिक्रो अवार्ड-फैलोशिप के सम्मान से नवाजा गया। वर्ष 2013 में ऐसोसिएशन आॅफ रेडिएशन ओंकोलोजिस्ट्स आॅफ इंडिया ने आपको ए.आर.ओ.आई.इंटरनेशनल ट्रेवल फेलोशिप सम्मान से सम्मानित किया और आपको फ्रांस के इंस्टीच्यूट गुस्तवे रोउसव विलज्युफ में शार्ट ट्रेनिंग लेने का मौका मिला। वर्ष 2012 में आपका चयन स्पेन के बार्सेलोना में बतौर द यंग साइंटिस्ट पोस्टर प्रेजेंटेशन अवार्ड के लिए हुआ। वर्ष 2003 में आपने टाटा मेमोरियल हॉस्पीटल मुंबई में नील जोसेफ ट्रेवल फैलोशिप में भाग लिया। वर्ष 2003 में ए.आर.ओ.आई.द्वारा नार्थ जोन का बेस्ट पेपर अवार्ड मिला। वर्ष 2000 ए.आर.ओ.आई. द्वारा डा. जे एम पिंटो मेमोरियल बेस्ट पेपर अवार्ड से नवाजा। आप ने सदैव अपने आप को समय के रहते मेडिकल प्रोफेशन के लिए आवश्यक अपडेट भी किया।
अकादमिक कोर्सों में आपने कोलकाता में वेरियन आई जी आर टी आर.पी.एम.कोर्स किया। वर्ष 2011 ए.आर.ओ.आई.-इ एस टी आर ओ टीचिंग कोर्स आॅन मॉडर्न ट्रीटमेंट आॅफ सर्वाइकल कैंसर का कार्सो किया। वर्ष 2008 में इंडियन एसोसिएशन आॅफ पेलिएटिव केयर के पैलिएटिव केयर सर्टिफिकेट कोर्स किया। रिसर्च प्रोजेक्ट्स में कई अहम प्रोजेक्टों में प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर, क्लीनिकल को इन्वेस्टिगेटर हैं। अब तक आपके 71 पब्लिकेशन्ज़ छप चुके हैं।
प्रो. भावना पी.जी.आई.को अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त समर्पित कर चुकी हैं। वे सुबह 8 बजे पी.जी.आई. आ जाती हैं जबकि जाने का कोई समय नहीं रहता। प्रो. भावना को पेंटिंग का खासा शौक है। वे अपने स्कूल और कालेज के दिनों में पेंटिंग किया करती थीं मगर प्रोफेशन के चलते यह शौक कब छूट गया पता ही नहीं चला। इसके अलावा उन्हें पुराने अंग्रेजी गाने सुनना और गुनगुनाना अच्छा लगता है। क्लासिकल म्युजिक उनके पंसदीदा संगीतों में से एक है। वे रोजाना कसरत करना कभी नहीं भूलती। आपका मानना है कि गर आप ने दूसरों का भला करना है तो पहले उस के लायक अपने आप को फिट रखें। आपके दोनों बेटे और पति क्रिकेट के खासे शौकीन हैं अतैव यह खेल आपको परिवार से बतौर सौगात मिला है जिसे आपने बखूबी अपना लिया है।
प्रो. भावना मानती हैं कि एक डाक्टर का फर्ज महज रोगी का इलाज करना ही नहीं होता बल्कि उस रोगी के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़ते हुए उसे समझना और उसकी हिम्मत बढ़ाना भी रहता है और यह सब सदैव चेहरे पर मुस्कुराहट ला कर ही किया जा सकता है। आप की हल्की सी मुस्कुराहट रोगी को रोग भुला देती है और उसे जीने की चाह बढ़ने लगती है। इस लिए डाक्टरों का रोगी के साथ पर्सनल टच खासा जरूरी रहता है। वे कहती हैं कि हम डाक्टरों को हर रोगी की इज्जत करनी चाहिए। वे स्वयं रेडियोथैरेपी के बाद जब भी समय मिलता है वे गाइनोकॉलिजिकल पेशेंट्स को ट्रीट करती हैं तथा गंभीर रोगियों की पैलियेटिव केयर के लिए भी जाती हैं। ऐसे में वे रोगियों के साथ और करीब से जुड़ती हैं जिसकी शायद उन्हें ज्यादा जरूरत रहती है, ऐसा कहना है प्रो. भावना का।

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Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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