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April 2021

देश के मौजूदा हालातों के मद्देनजर क्या राष्ट्रीय बैड बैंक स्थापित करने का विचार सही है ?

बैंकिंग क्षेत्र पर निर्भर भारत जैसी अर्थव्यवस्था के बेहतर ढंग से संचालन के लिये सुलभ वित्तीय सेवाओं और ऋण प्रवाह को सुनिश्चित करने हेतु बैंकों की अच्छी स्थिति होना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि कई वर्षों से भारतीय बैंक गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एन पी ए) संकट से जूझ रहे हैं जिसके कारण पूरी अर्थव्यवस्था में आर्थिक समस्याएँ व्याप्त हैं। इसके अलावा कोरोना वायरस संकट के कारण आर्थिक विकास में गिरावट ने बैंकिंग क्षेत्र के तनाव को और बढ़ा दिया है। इसलिये बैंकों की स्थिति को पुन: बहाल करने के लिये बजट 2021 में समस्या समाधान के एक उपाय यानी राष्ट्रीय बैड बैंक स्थापित करने का विचार प्रस्तावित किया गया है । हालाँकि बैड बैंक का विचार अपने आप में बहस का विषय है। सब से पहले समझ लेते हैं कि आखिर बैड बैंक होता क्या है?
बैड बैंक एक ऐसी इकाई है जो बैड लोन या गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एन पी ए) के एग्रीगेटर के रूप में कार्य करता है और उन्हें बैंकिंग क्षेत्र से रियायती मूल्य पर खरीदता है, फिर उनके पुनर्भरण/रिकवरी और समाधान/रिजॉल्यूशन की दिशा में काम करता है। इन ऋणों को गैर-निष्पादित के रूप में वर्गीकृत किया गया है और वे पहले से ही डिफॉल्ट रूप में हैं। ये बैड लोन बैंक की बैलेंसशीट पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। बैड बैंक एक परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (असेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी-ए आर सी) के समान है, जहाँ वह बैंकों से इन ऋणों को स्थानांतरित करते हुए अधिकतम संभव राशि वसूलने का प्रबंधन करता है। बजट 2021 में एक परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी और परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी (असेट मैनेजमेंट कंपनी-ए एम सी) की संरचना का प्रस्ताव किया गया था, जिसमें ए आर सी ऋण एकत्र करेगा, जबकि ए एम सी एक संकल्प प्रबंधक के रूप में कार्य करेगा। प्रस्तावित संरचना उधारदाताओं से कुल संपत्ति अर्जित करने के लिये एक राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (एन ए आर सी) की स्थापना की परिकल्पना करती है, जिसे राष्ट्रीय परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी (एन ए एम सी) द्वारा प्रबंधित किया जाएगा। तनावग्रस्त परिसंपत्ति समाधान (स्ट्रेस्ड असेट रेज़ोल्यूशन ) के लिये समर्पित एक कुशल और पेशेवर सेट-अप को रणनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी के लिये रणनीतिक निवेशकों, ए आई एफ विशेष स्थिति फंड, तनावग्रस्त परिसंपत्ति फंड आदि के माध्यम से तनावग्रस्त परिसंपत्ति में संस्थागत फंडिंग को आकर्षित करने के लिये प्रयोग में लाया जाएगा। इसके अलावा इन तनावग्रस्त परिसंपत्तियों को बैड बैंकों में स्थानांतरित करने से नकदी में 15% और संप्रभु गारंटीशुदा सुरक्षा प्राप्तियों (साव्रन गारंटी सिक्योरिटी रिसीप्ट्स) में 85% की वसूली होगी। इसमें सरकार द्वारा निश्चित समय के लिये शून्य-जोखिम भार की गारंटी दी जाती है। इस दृष्टिकोण का शुद्ध प्रभाव एक खुली प्रक्रिया और तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के लिये एक जीवंत बाजार का निर्माण करना होगा।
बैड बैंकों के पक्ष में विचार रखने वालों का कहना है कि इस में बैंकों को उधार देने का प्रावधान रहेगा यानि बैड बैंक के तहत वसूल किये गए मूल्य और महत्त्वपूर्ण उधार लाभ शामिल रहते हैं। पूंजी को पूरी तरह से प्रावधानित खराब परिसंपत्तियों (प्रोवीजन्ड बैड असेट्स) से कम मूल्य पर मुक्त किया जाता है। संप्रभु गारंटी (साव्रन गारंटी) के कारण पूंजी सुरक्षा प्राप्तियों से मुक्त हो गई। नकद प्राप्तियाँ जो बैंकों में वापस आती हैं और उधार के लिये लीवरेज की जा सकती हैं, को बैलेंसशीट के सामान्य प्रावधानों से मुक्त किया गया है। यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित है। एक बैड बैंक की कई अंतर्राष्ट्रीय सफलता की कहानियाँ उसके मिशन को सकारात्मकता प्रदान करती है और यह मानने का कोई कारण नहीं है कि भारत में इन उद्देश्यों को पूरा नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद अमेरिका ने संकटग्रस्त परिसंपत्ति राहत कार्यक्रम (टी ए आर पी) लागू किया, जिसने इस संकट से निकलने में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सहायता प्रदान की। इस प्रकार की अवधारणा एक बैड बैंक के विचार के समरूप ही बनाई गई थी। इसे क्रेडिट फ्लो पोस्ट-कोविड का पुनरुद्धार के रूप में देखा जा रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एक बैड बैंक 5 लाख करोड़ से अधिक की एन पी ए पूंजी मुक्त करने में मदद कर सकता है, ये बैड लोन के कारण आर्थिक रूप से संकटग्रस्त होते हैं। ऐसा नहीं है कि बैड बैंक के सारे पक्ष में ही हैं इसका कुछ लोग विरोध भी कर रहे हैं उनका तर्क है कि यह एक स्थायी समाधान नहीं है। एक बैड बैंक बनाने से समस्या का केवल स्थानांतरण हो रहा है न कि हम इसका हल निकाल रहे हैं। एन पी ए की समस्या को हल करने के लिये बुनियादी सुधारों के बगैर बैड बैंक बिना किसी वसूली के बैड लोन का एक गोदाम बनने की संभावना है। इसके अलावा एक महत्त्वपूर्ण चिंता बैड बैंक के लिये पूंजी के संग्रहण की है। महामारी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था में संकटग्रस्त संपत्तियों के लिये खरीदार ढूँढना मुश्किल है और सरकार भी एक कठिन वित्तीय स्थिति से गुजर रही है। यह निर्धारित करने के लिये कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है कि किस मूल्य और किन ऋणों को बैड बैंक में स्थानांतरित किया जाना चाहिये। यह सरकार के लिये राजनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकता है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि बैड बैंक स्थापित करने से बैंकों के बीच नैतिक जोखिम की समस्या भी पैदा हो सकती है, इससे वे अपने लापरवाहपूर्ण ऋण देने के तरीकों को जारी रखेंगे, जिससे एन पी ए की समस्या और भी बढ़ जाएगी। कुल मिला कर गर देखा जाये तो जब तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्रबंधन राजनेताओं और नौकरशाहों के प्रति निष्ठावान रहेंगे, तब तक उनकी व्यावसायिकता में कमी बनी रहेगी और बाद में इस प्रकार की समस्याओं का सामना यकीनन करना ही पड़ेगा।
इसलिये बैड बैंक एक अच्छा विचार हो सकता है, बशर्ते बैंकिंग प्रणाली में अंतर्निहित संरचनात्मक समस्याओं जैसी मुख्य चुनौती से निपटने और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बेहतर बनाने के लिये राष्ट्रीय बैंकों में बुनियादी स्तर पर व्यापक सुधार किया जाये।