लोहड़ी
सुंदर-मुंदरिये हो-तेरा कौन विचारा हो-दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले दी धी ब्याई हो
वरिंद्र पाल सिंहः लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध त्योहार है। यह मकर संक्रान्ति के एक दिन पहले मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार का उल्लास रहता है। रात्रि में खुले स्थान में परिवार और आस-पड़ोस के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बना कर बैठते हैं। इस समय रेवड़ी, मूंगफली, लावा आदि खाए जाते हैं।
लोहड़ी पौष के अंतिम दिन, सूर्यास्त के बाद (माघ संक्रांति से पहली रात) यह पर्व मनाया जाता है। यह प्राय: १२ या १३ जनवरी को पड़ता है। यह मुख्यत: पंजाब का पर्व है, यह द्योतार्थक (एक्रॉस्टिक) शब्द लोहड़ी की पूजा के समय व्यवहृत होने वाली वस्तुओं के द्योतक वर्णों का समुच्चय जान पड़ता है, जिसमें ल (लकड़ी) +ओह (गोहा = सूखे उपले) +ड़ी (रेवड़ी) = ‘लोहड़ी’ के प्रतीक हैं। श्वतुर्यज्ञ का अनुष्ठान मकर संक्रांति पर होता था, संभवत: लोहड़ी उसी का अवशेष है। पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी से बचने के लिए आग भी सहायक सिद्ध होती है-यही व्यावहारिक आवश्यकता ‘लोहड़ी’ को मौसमी पर्व का स्थान देती है।
लोहड़ी से संबद्ध परंपराओं एवं रीति-रिवाजों से ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक गाथाएँ भी इससे जुड़ गई हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से ‘त्योहार’ (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि) भेजा जाता है। यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति का प्रायश्चित्त ही इसमें दिखाई पड़ता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में ‘खिचड़वार’ और दक्षिण भारत के ‘पोंगल’ पर भी-जो ‘लोहड़ी’ के समीप ही मनाए जाते हैं-बेटियों को भेंट जाती है।
लोहड़ी से २०-२५ दिन पहले ही बालक एवं बालिकाएँ ‘लोहड़ी’ के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। संचित सामग्री से चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। मुहल्ले या गाँव भर के लोग अग्नि के चारों ओर आसन जमा लेते हैं। घर और व्यवसाय के कामकाज से निपटकर प्रत्येक परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है। रेवड़ी (और कहीं कहीं मक्की के भुने दाने) अग्नि की भेंट किए जाते हैं तथा ये ही चीजें प्रसाद के रूप में सभी उपस्थित लोगों को बाँटी जाती हैं। घर लौटते समय ‘लोहड़ी’ में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है।
जिन परिवारों में लड़के का विवाह होता है अथवा जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या गाँव भर में बच्चे ही बराबर बराबर रेवड़ी बाँटते हैं। लोहड़ी के दिन या उससे दो चार दिन पूर्व बालक बालिकाएँ बाजारों में दुकानदारों तथा पथिकों से ‘मोहमाया’ या महामाई (लोहड़ी का ही दूसरा नाम) के पैसे माँगते हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में प्रयुक्त करते हैं।
यह लोहड़ी का त्यौहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू काश्मीर और हिमांचल में धूम धाम तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। पंजाब का परंपरागत त्योहार लोहड़ी केवल फसल पकने और घर में नए मेहमान के स्वागत का पर्व ही नहीं, यह जीवन में उल्लास बिखराने वाला उत्सव है। लोहड़ी के दिन गुरुद्वारों में भी इस पर्व पर श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ रहती है। गुरुद्वारा हरिमंदिर साहिब एवं अन्य गुरुद्वारों के सरोवरों में लोग डूबकी लगाकर पुण्य प्राप्त करते हैं। गुरुद्वारों में विशेष शबद कीर्तन भी होता है। इस उत्सव के दिन का अनोखा ही नजारा रहता देता है जिसमें श्रद्धालुजन गुरुद्वारों के पवित्र सरोवरों में स्नान एवं दान-पुण्य में मशगूल रहते हैं। मकर संक्राति से पूर्व शाम के समय लोग लकड़ियां जलकर आग सेंकते हुए लोक गीतों का आनंद लेते हैं। ढोल की थाप पर थिकरते लोग गिद्दा और भांगड़ा करते हुए लोहड़ी पर्व मनाते हैं।
लोहड़ी का त्यौहार और दुल्ला भट्टी की कहानी
लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता हैं। दुल्ला भट्टी मुगल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था! उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न की मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी भी हिन्दू लडको से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई। दुल्ला भट्टी एक विद्रोही था और जिसकी वंशवली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे जो की संदल बार में था अब संदल बार पकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था।
माघ का आगमन
लोहड़ी पर्व क्योकि मकर-संक्रान्ति से ठीक पहले क ी संध्या में मनाया जाता है तथा इस त्यौहार का सीधा संबन्ध सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से होता है। लोहड़ी पौष की आखिरी रात को मनायी जाती है जो माघ महीने के शुभारम्भ व उत्तरायण काल का शुभ समय के आगमन को दशार्ता है और साथ ही साथ ठंड को दूर करता हुआ मौसम में बदलाव का संकेत बनाता है।


किसानों की कर्ज माफी के नाम पर हंगामा, बैंकों को एक लाख करोड़ देने पर चुप्पी
सरकार सरकारी बैंकों में एक लाख करोड़ रुपये क्यों डाल रही है? किसान का लोन माफ करने पर कहा जाता है कि फिर कोई लोन नहीं चुकाएगा. यही बात उद्योगपतियों के लिए क्यों नहीं कही जाती? क्या आपको पता है कि बैंकों को फिर से 410 अरब रुपये दिए जा रहे हैं? वित्त मंत्री जेटली ने संसद से इसके लिए अनुमति मांगी है. यही नहीं सरकार ने बैंकों को देने के लिए बजट में 650 अरब रुपये का प्रावधान रखा था. बैंकों की भाषा में इसे कैपिटल इन्फ्लो कहा जाता है. सरकार बैंकों को एक साल में 1 लाख करोड़ रुपये क्यों देना चाहती है? आप किसी भी विश्लेषण को पढ़िए, यही जवाब मिलेगा कि बैंकों ने पहले जो लोन दिए थे वो चुकता नहीं किए गए. फिर से लोन देने के लिए पैसे नहीं हैं. इसलिए सरकार अपनी तरफ से बैंकों को पैसे दे रही है ताकि बाजार में लोन के लिए पैसे उपलब्ध हो सके. किसने लोन लेकर नहीं चुकाए हैं और किसे नया लोन देना है, इन दो सवालों के जवाब से सब कुछ साफ हो जाएगा. क्या यह कैपिटल इन्फ्लो के नाम पर कर्ज़ माफी नहीं है? भारतीय रिजर्व बैंक ने 11 सरकारी बैंकों को प्रांप्ट करेक्टिव एक्शन की सूची में डाल दिया था. इन सभी से कहा गया था कि वे एनपीए खातों की पहचान करें, लोन को वसूलें, जो लोन न दे उस कंपनी को बेच दें और नया लोन देना बंद कर दें. बैंकों का एनपीए जब खास सीमा से ज्यादा हो गया तब यह रोक लगाई गई क्योंकि बैंक डूब सकते थे. अब हंगामा हुआ कि जब बैंक लोन नहीं देंगे तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार रुक जाएगी. पर ये उद्योगपति सरकारी बैंकों से ही क्यों लोन मांग रहे हैं, प्राइवेट से क्यों नहीं लेते? इनके लिए सरकार सरकारी बैंकों में एक लाख करोड़ रुपये क्यों डाल रही है? किसान का लोन माफ करने पर कहा जाता है कि फिर कोई लोन नहीं चुकाएगा. यही बात इन उद्योगपतियों से क्यों नहीं कही जाती है? सितंबर 2018 में बैंकों का नॉन परफार्मिंग असेट 8 लाख 69 हजार करोड़ रुपये का हो गया है. जून 2018 की तुलना में कुछ घटा है क्योंकि तब एनपीए 8 लाख 74 हजार करोड़ रुपये था. लेकिन सितंबर 2017 में बैंकों का एनपीए 7 लाख 34 हजार करोड़ रुपये था.
बैंकों का ज्यादातर एनपीए इन्हीं उद्योगपतियों के लोन न चुकाने के कारण होता है. क्या वाकई रिजर्व बैंक की सख़्ती के कारण बैंकों ने लोन देना बंद कर दिया है?
बिजनेस स्टैंडर्ड में तमल बंधोपाध्याय का संपादकीय लेख छपा है. उन्होंने लिखा है कि बैंक सेक्टर के कर्ज़ देने की रफ्तार बढ़ी है. 15 प्रतिशत हो गया है. जीडीपी की रफ़्तार से डबल. फिर सरकार को क्यों लगता है कि यह काफी नहीं है. बैंकों को और अधिक कर्ज़ देना चाहिए. 1 लाख करोड़ रुपये जब सरकारी बैंकों को मिलेगा तब वे रिजर्व बैंक की निगरानी से मुक्त हो जाएंगे. लोन देने के लिए उनके हाथ फिर से खुल जाएंगे. सरकार बैंकों को 1986 से पैसे देते रही है, लेकिन उसके बाद भी बैंक कभी पूंजी संकट से बाहर नहीं आ सके. 1986 से 2017 के बीच एक लाख करोड़ रुपये बैंकों में दिए गए हैं. 11 साल में एक लाख करोड़ से अधिक की राशि दी जाती है. अब इतनी ही राशि एक साल के भीतर बैंकों को दी जाएगी. बिजनेस स्टैंडर्ड के एक और लेख में देबाशीष बसु ने लिखा है कि यह सीधा-सीधा दान था. इसका बैंकों के प्रदर्शन में सुधार से कोई लेना-देना नहीं था. दस लाख करोड़ का एनपीए हो गया, इसके लिए न तो कोई नेता दोषी ठहराया गया और न बैंक के शीर्ष अधिकारी. नेता हमेशा चाहते हैं कि बैंकों के पास पैसे रहें ताकि दबाव डालकर अपने चहेतों को लोन दिलवाया जा सके, जो कभी वापस ही न हो. देबाशीष बासु ने मोदी सरकार के शुरूआती फैसलों में से एक की ओर ध्यान दिलाया है. चार राज्यों में 23 जिÞला सहकारिता बैंकों को पुनर्जीवित करना था. इन सभी के पास लाइसेंस नहीं थे. 23 में से 16 बैंक यूपी में थे. नियमों के अनुसार इन सबको बंद कर दिया जाना था मगर सरकार ने इन्हें चलाने की अनुमति दी. बसु ने लिखा है कि सरकार इस विवादास्पद फैसले से क्या संकेत देना चाहती थी? देबाशीष बसु ने इसके बारे में विस्तार से नहीं लिखा है मगर इस सूचना को और विस्तार देने की जरूरत है. बिना लाइसेंस के सहकारिता बैंक खुलवा देने का खेल क्या है, इसे मैं भी समझने का प्रयास करूंगा. तमल बंधोपाध्याय ने लिखा है कि क्या बैंकों को कर्ज़ देना आता है? शायद नहीं. अगर पता होता तो वे इस संकट में नहीं होते. अर्थव्यवस्था की हालत पर दोष मढ़ना सही नहीं है क्योंकि इसी माहौल में प्राइवेट बैंक भी काम करते हैं. उनके एनपीए की हालत इतनी बुरी क्यों नहीं है? उन्होंने लिखा है कि सरकार बैंकों को जो लाख-लाख करोड़ देती है वह किसानों की कर्ज़ माफी से कोई अलग नहीं है. अगर सरकार इसी तरह से बैंकों में पूंजी ठेलती रही तो क्या उद्योगपतियों पर कर्ज़ चुकाने का दबाव हल्का नहीं होगा, वैसे ही जैसे किसान कर्ज़ नहीं देंगे. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक और रिपोर्ट पर गौर करने की जरूरत है. अभिषेक वाघमरे और संजीब मुखर्जी की रिपोर्ट है कि यूपी चुनाव में किसानों की कर्ज़ माफी के वादे के बाद से अब तक सात राज्यों में करीब पौने दो लाख करोड़ रुपये से अधिक कर्ज़ माफी का ऐलान हो चुका है. लेकिन महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब और कर्नाटक में 40 प्रतिशत किसानों का ही लोन माफ हुआ है. दो राज्य भाजपा के हैं और दो कांग्रेस के. उत्तर प्रदेश में लघु और सीमांत किसानों के एक लाख तक के कर्ज़ माफ होने थे. अप्रैल 2017 में फैसले का ऐलान हो गया. दावा किया गया था कि 86 लाख किसानों को लाभ होगा. इस पर 364 अरब रुपये खर्च होंगे. लेकिन 21 महीने बीच जाने के बाद मात्र 44 लाख किसानों की ही कर्ज़ माफी हुई है. यही नहीं कर्ज़ माफी के बाद से इन चार राज्यों में खेती पर दिया जाने वाला कर्ज़ भी कम हो जाता है. इस रिपोर्ट को पढ़िए तो काफी कुछ समझ आएगा. हिन्दी के पाठकों के लिए जरूरी है कि वे मुद्दों को समझने के लिए अलग-अलग और कई प्रकार के सोर्स का सहारा लें. तभी समझ आएगा कि दस लाख करोड़ का लोन नहीं चुकाने वाले चंद मुट्ठी भर लोग मौज कर रहे हैं. उन्हें और लोन मिले इसके लिए सरकार 1 लाख करोड़ रुपये सरकारी बैंकों को दे रही है. किसानों के लोन माफ होते हैं, कभी पूरे नहीं होते हैं, होते भी हैं तो उन्हें कर्ज़ मिलने से रोका जाने लगता है. उद्योगपतियों को लोन देने में दिक्कत नहीं है, दिक्कत है लोन नहीं चुकाने और उसके बाद भी नया लोन देने के लिए सरकारों के बिछ जाने से. फिर क्यों किसानों की बात आती है तो मिडिल क्लास लतीफे बनाने लगता है. अच्छा है अलग-अलग सोर्स से दस-पांच लेख पढ़ ले, बहस की गुणवत्ता लतीफों से बेहतर हो जाएगी.
(यह लेख मूल रूप से रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा पर प्रकाशित हुआ है.)

टैंडर हार्ट स्कूल सेक्टर 33 चंडीगढ़ के एनुअल फंक्शन ने सब का मन मोहा
चंडीगढ़: चंडीगढ़ के सेक्टर-33 स्थित टैंडर हार्ट स्कूल के प्रिंसिपल विक्रांत सूरी के नेतृत्व में जहां स्कूल के एनुअल फंक्शन ने अपनी धमाकेदार प्रस्तुति से आउडिटोरियम में उपस्थित सभी दर्शकों का मन मोह लिया तो वहीं जो लोग इस समारोह में किन्हीं कारणोवश शिरकत नहीं भी कर सके, उन्हें भी घर बैठे ही यू ट्यूब पर लाइव के जरिए कर मंत्रमुग्ध कर दिया। गौरतलब है कि पंजाब और हरियाणा की राजधानी एवं केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में पहला ऐसा मौका था जब किसी पढ़ाई में अव्वल रहने वाले स्थानीय स्कूल ने अपने वार्षिक समारोह को यू ट्यूब पर लाइव दिखाने का हौसला किया हो। लाइव कार्यक्रम की यह प्रक्रिया जहां तकनीकी तौर पर खासी मुश्किल और चैलेंजिंग मानी
जाती है तो वहीं उन लोगों के लिए रोमांचभरी और खास बन जाती है जो देश ही नहीं विश्व के कोने कोने पर बैठे अपने सुपुत्रों व सुपुत्रियों की लाइव परफार्मेंस देख रहे होते हैं। स्कूल के प्रिंसिपल ने इसका पूरा श्रेय स्कूल में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं, स्कूल के प्रबंधन और स्टाफ को दिया है। उनका कहना है कि यह सब टीम वर्क होता है तभी आपको शतप्रतिशत रिजल्ट मिलते हैं।
इस समारोह के दौरान स्कूल की विभिन्न कक्षाओं के बच्चों ने कल्चरल एक्टीविटीज में बड़े जोश के साथ हिस्सा लिया। 400 से ज्यादा लोगों से खचाखच भरे आउडटिोरियम में सब ने इस समारोह का आनंद लिया। इस मौके पर डेयर टू ड्रीम शो ने सभी दर्शकों क ो चकित कर दिया। इस अवसर पर बुजुर्ग के रूप में दर्शाये हरीश चंद ने जहां दर्शकों के साथ अपने जीवन के अहम पहलूओं को सांझा करते हुए समारोह को आगे बढ़ाया तो वहीं यह साबित भी कर दिया कि उम्र तो महज एक संख्या भर होती है जबकि इसका आपकी क्षमता और काम पर कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ता और न ही पढ़ना चाहिए आपको उम्र की हर दहलीज पर उत्साह व खुशी से काम करना चाहिए और आप महसूस करने लगेंगे कि जीवन का हर पल कितना सुखद व मोहक होता है। आउडिटोरियम में जहां नौनिहालों ने अपने नन्हें कदमों के नृत्य से सभी का मन मोह लिया तो वहीं सीनियर छात्रों के मेडले और पंजाबी भंगड़े ने सभी दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर दिया। समारोह के अंत में स्कूली छात्रों ने राष्ट्र को सलामी देकर देश भक्ति की अनूठी मिसाल भी कायम की।

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cdadmin

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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