प्रज्ञा शारदा

हो गई पराई

पार्लर जाने को घर से निकली
तो चाची ने भावुक हो गले से लगाया
आँखें हो गईं नम
रुँघे गले से बोली
बिटिया हो गई पराई
समझो हो गई बिदाई।

माँ हुई हैरान
तो चाची हाथ पकड़ कर बोली
पार्लर से हो त्यार वो
सीधा मंडप में जाएगी
फेरे होंगे चार
फिर बिदाई इसकी हो जाएगी
ठीक ही तो कहती हूँ
अब तो बस बिटिया
पग फेरे को ही आएगी।

पग फेरे को आई
तो ऐसे हुई अगुआई
कि मुझे भी लगने लगा
सही मायनों में
मैं अब हो गई पराई।

मायके आती
काम को उठती
तो माँ कहती
बैठ
तू कौन सा
रोज-रोज आएगी
मैं कहती चाय मैं ही बनाऊँगी
तो पिता कहते
बैठ
तुझे मेरी चाय बनानी नहीं आएगी
क्योंकि
अब मेरी चाय में
दूध और शक्कर
रहती है कम
तू नहीं जानती
शक्कर की बीमारी ने
कर दिया है मुझे तंग
तुझे पहले नहीं बताया
तू परेशान होगी
अपनी गृहस्थी के काम छोड़
बेकार में हैरान होगी
तब फिर एक बार मुझे लगा
कि मैं हो गई पराई।

जब भी मायके आती तो पापा पूछते
कितने दिन को आई हो
तो दिल में इक हूक सी उठती
लगता सच में
अब हो गई हूँ पराई।

माँ सूट साड़ी पसंद करवाती
घर ले जाने को लड्डू मठ़री बनाती
पूछती और क्या बना दूँ
पता नहीं
फिर कब होगा
तेरा आना
तब यकायक याद आता
कि अरे सचमुच
मैं तो कुछ रोज को हूँ आई
मुझे तो है
कुछ रोज में चले जाना।

शादी को हो गए हैं 40 बरस
आज भी माँ
हर त्योहार पर पूछती है
क्या ला दूँ
बता दो जो तुम खाओ
तब मैं सोचती
मैं कभी भी मायके की न हो पाई
बेटियाँ क्यों होती हैं इतनी पराई
बेटियाँ क्यों होती हैं इतनी पराई

 

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cdadmin

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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