Dr Rajiv Kapila

सोवा रिगपा (आमची)

सोवा रिग्पा (तिब्बती :गग्से ब रिग पा) तिब्बत सहित हिमालयी क्षेत्रों में प्रचलित प्राचीन उपचार पद्धति है। भारत के हिमालयी क्षेत्र में ‘तिब्बती’ या ‘आमचि’ के नाम से जानी जाने वाली सोवा-रिग्पा विश्व की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धतियों में से एक है। सोवा रिगपा (आमची) अनुसंधान केंद्र- लेह, केंद्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान परिषद, आयुष विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की एक परिसरीय इकाई है। इस केंद्र की स्थापना लेह लद्दाख में सन 1976 में हिमालय चिकित्सा पद्धति सोवा रिगपा जिसे तिब्बती या आमची औषधि के रूप में जाना जाता है। स्थापना के समय से ही यह अनुसंधान केंद्र सीमित संसाधनों से सोवा रिगपा के अनुसंधान एवं विकास में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। भारत में इस पद्धति का प्रयोग जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र, लाहौल-स्पीति (हिमाचल प्रदेश), सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तथा दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में किया जाता है। सोवा-रिग्पा के सिद्धांत और प्रयोग आयुर्वेद की तरह ही हैं और इसमें पारंपरिक चीनी चिकित्सा विज्ञान के कुछ सिद्धांत भी शामिल हैं। सोवा रिग्पा के चिकित्सक देख कर, छू कर एवं प्रश्न पूछकर इलाज करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह पद्धति भगवान बुद्ध द्वारा 2500 वर्ष पहले प्रारंभ की गई थी। बाद में प्रसिद्ध भारतीय विद्वानों जैसे जीवक, नागार्जुन, वाग्भट्ट एवं चंद्रानंदन ने इसे आगे बढ़ाया। इसका इतिहास 2500 वर्षों से अधिक का रहा है। सोवा-रिगपा प्रणाली यद्यपि बहुत प्राचीन है किन्तु हाल ही में मान्यता प्रदान की गई है। यह प्रणाली अस्थमा, ब्रोंकिटिस, अर्थराइटिस जैसी पुराने रोगों के लिए प्रभावशाली मानी गई है।
सोवा-रिगपा का मूल सिद्धांत निम्नलिखित है
(1) इलाज के लिए शरीर और मन का विशेष महत्व है
(2) एन्टीडॉट, अर्थात इलाज
(3) इलाज की पद्धति
(4) बीमारी को ठीक करने वाली दवाईयां ; और
(5) फार्माकॉलॉजी।
मुख्य लक्ष्य एवं उद्देश्य
-आमची चिकित्सा पद्धति का मौलिक अनुसंधान एवं औषधि योगों द्वारा आतुरीय अनुसंधान का कार्य करना।
-लद्दाख-हिमालय क्षेत्र के वानस्पतिक एवं खनिज संसाधनों का अन्वेषण एवं प्रलेखन करना।
-सोवा-रिगपा की संपन्न साहित्य संपदा का अनुसंधान करना।
-आमची पद्धति के अभ्यास को सुदृढ़ एवं विकसित करना।
-स्थानिक जनता की चिकित्सा सेवा करना।
गतिविधियां एवं उपलब्धियां
आतुरीय अनुसंधान- इस योजना के अंतर्गत आमची औषधि योगों द्वारा विभिन्न रोगों पर वैज्ञानिक ढंग से आतुरीय अनुसंधान किया गया है। अधिकांश रोगों में औषधि बहुत प्रभावकारी सिद्ध हुई है। कुछ मुख्य रोग जिन पर अध्यन किया गया है वे निम्न हैं:-
-पड़कन-मुगपो (पेप्टिक अल्सर-आमाशयिक-आंत्रिक व्रण)
-टेक-डम (संधिशोथ)
-पग्स-नड़ (चर्मरोग)
-थगलंग-स्टोड तसांग (उच्च रक्तचाप)
वानस्पतिक एवं खनिज अन्वेषण
इस कार्यक्रम के अंतर्गत सोवा रिगपा अनुसंधान केंद्र द्वारा लद्दाख एवं लाहौल स्पिति क्षेत्र का व्यापक औषधियों में उपयुक्त-वानस्पतिक सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वेक्षण में कुल 1000औषधि पादप प्रजातियों का संग्रह किया गया जिसमें 500 प्रजातियों का विभिन्न भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में प्रयोग किया जाता है। आमची पद्धति में प्रयुक्त औषधि पादपों को शोध पत्रों के रूप में प्रलेखित किया गया है तथा ट्रांस-हिमालय औषधि पादपों पर एक सूची पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। लद्दाख के विभिन्न स्थानों से लगभग पचास विभिन्न खनिज पत्थर संग्रहित किये गये हैं।
साहित्यक अनुसंधान परियोजना
सोवा रिगपा की संपन्न साहित्य संपदा तिब्बती भाषा में है, जिसमें बड़ी संख्या में अनुवादित भारतीय शास्त्रीय चिकित्सा साहित्य एवं उनकी व्याख्याएं सम्मिलित हैं, जो भारतीय एवं तिब्बती विद्वानों द्वारा लिखी गई हैं। लद्दाख में प्राचीन साहित्य के स्रोत की सूची एवं संख्या का अभिनिर्धारण किया गया है। भारतीय चिकित्सा साहित्य में अनुवादित तिब्बती पाण्डुलिपियों की संदर्भ ग्रंथ सूची भी तैयार की गई है।
विस्तृत गतिविधियां
सोवा रिगपा अनुसंधान केंद्र लेह द्वारा लद्दाख में आमची पद्धति को सुदृढ़ एवं विकसित करने हेतु विभिन्न पुनर्विन्यास प्रशिक्षण, संगोष्ठी एवं कार्यशालाओं का आयोजन किया गया है। इन कार्यक्रमों द्वारा इस केंद्र के अनुसंधान निष्कर्ष एवं पारंपरिक औषधि तथा औषधि पादपों के क्षेत्र में नए विकास आमची पद्धति के लोगों को संप्रेषित किये गये हैं।
औषधि पादपों की कृषि एवं संरक्षण
विश्व की सभी जड़ी बूटी आधारित चिकित्सा पद्धति के बने रहने हेतु औषधि पादपों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। वर्तमान में जड़ी बूटी आधारित उत्पादों की में वृद्धि पारिस्थिति की परिवर्तन, अवैज्ञानिक एवं अत्यधिक उपयोग आदि के कारण अनेक पादप प्रजातियों के अस्तित्व में भयंकर आपदा उत्पन्न हो गई है। इस परिस्थिति से बचने के लिए हिमालय क्षेत्र में सेवा-रिगपा अनुसंधान केंद्र लेह लद्दाख क्षेत्र के कुछ महत्वपूर्ण एवं आपदाग्रस्त औषधि पादपों की कृषि एवं संरक्षण हेतु कार्यरत है। औषधि पादपों के कृषिकरण हेतु इस केंद्र द्वारा कतिपय ग्रामीण आमची (पारंपरिक चिकित्सक) को नियोजित किया गया है। शीत मरुस्थलीय पादपों के संरक्षण एवं प्रदर्शन के उद्देश्य से इस केंद्र द्वारा ट्रांस हिमालय औषधीय पादप उद्यान की स्थापना प्रारंभ की गई है।

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cdadmin

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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