Health Article-वैदिक यज्ञ चिकित्सा , by Dr. Rajiv Kapila

Share this News:




वैदिक यज्ञ चिकित्सा

यज्ञ चिकित्सा में वे सभी आधार मौजूद हैं जिनसे शारीरिक व्याधियों एवं बीमारियों, मानसिक आधियों एवं विकृतियों का उपचार सम्भव हो सके। प्राचीनकाल में यज्ञ को भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति का आधार माना जाता था। उसे संकट मोचन का अमोघ अस्त्र कहा जाता था। अनेकानेक लोगों की सुविस्तृत महात्म्य शृंखला यज्ञ प्रक्रिया के साथ जुड़ी हुई है, जिनमें से दो प्रत्यक्ष लाभ ऐसे हैं जिनका जन साधारण से सम्बन्ध हैं।
सांस को नासिका मार्ग से फेफड़े के केन्द्र संस्थान तक पहुँचाने की सड़क मस्तिष्क के विशाल क्षेत्र में होकर ही गुजरती हैं। इस प्रथम प्रयास में स्वभावत: अधिक सामर्थ्य रहती हैं। सांस में भरे हुए तत्वों का सर्वप्रथम सर्वाधिक प्रभाव मस्तिष्क पर ही होता है। ठण्ड लगने पर जुकाम, सिरदर्द होने के कारण यही है कि ठण्डी हवा मस्तिष्क को सर्वप्रथम प्रभावित करती है। धूलि में छींक आने, दुर्गन्ध में सिरदर्द होने लगने, क्लोरोफार्म सूँघने से बेहोश हो जाने जैसे उदाहरण यही बताते हैं कि सांस का पहला चरण मस्तिष्क को ही प्रभवित करता है। स्पष्ट है कि यदि श्वांस मार्ग से मस्तिष्क संस्थान को प्रभावित करने का काम लिया जाय तो उससे न केवल उन्माद, अपस्मार, सिरदर्द जैसे प्रत्यक्ष रोगों का ही उपचार हो सकता है, मन्द बुद्धि, स्मरण शक्ति की कमी जैसी असमर्थताओं और मनोविकारों की विक्षुब्धताओं के निराकरण का मार्ग खुल सकता है।
यज्ञ चिकित्सा में वे सभी आधार मौजूद हैं जिनसे शारीरिक व्याधियों एवं बीमारियों, मानसिक आधियों एवं विकृतियों का उपचार सम्भव हो सके। प्राचीनकाल में यज्ञ को भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति का आधार माना जाता था। उसे संकट मोचन का अमोघ अस्त्र कहा जाता था। अनेकानेक लोगों की सुविस्तृत महात्म्य शृंखला यज्ञ प्रक्रिया के साथ जुड़ी हुई है, जिनमें से दो प्रत्यक्ष लाभ ऐसे हैं जिनका जन साधारण से सम्बन्ध हैं। शारीरिक अस्वस्थता एवं मानसिक अस्त- व्यस्तता से निवृत्ति की दो समस्यायें ऐसी हैं, यदि इन्हें सम्भाला- सुधारा जाता है तो समझना चाहिए कि मानव जाति की आधी कठिनाई का हल निकल आया।
परोक्त घटकों के साथ ही एक अन्य महत्त्वपूर्ण शक्ति है यज्ञ ऊर्जा। ऊर्जा का नियन्त्रण यज्ञकुण्डों के आकार द्वारा किया जाता है। ज्यामितीय सिद्धान्तों के अनुसार ही इन कुण्डों का स्वरूप बनाया जाता है। जिससे उत्सर्जित ज्वाला एवं ऊर्जा का प्रभाव सारे वातावरण पर उचित अनुपात में पडे़। विभिन्न औषधियाँ जलकर अलग- अलग ऊर्जा का स्वरूप देती हैं। ऊर्जास्तर के अनुपात से ही याजक के शरीर एवं मन पर औषधि का वांछित प्रभाव पड़ता है।
यज्ञ चिकित्सा अत्यंत उत्कृष्ट थी। अथर्ववेद में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। अथर्ववेद मंडल 3 सूक्त 11 मंत्र 2 के अनुसार किसी की आयु क्षीण हो चुकी है, जीवन से निराश हो चुका है। मृत्यु के बिल्कुल समीप पहुँच चुका है। इससे स्पष्ट होता है कि यज्ञ थैरेपी संसार की सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति है जो मृत्यु के मुख से भी मनुष्य को छीन कर स्वस्थ बनाने की क्षमता रखती है।
अथर्ववेद में रोगोत्पादक कृमियों का वर्णन आता है हो श्वास, वायु, भोजन जाल द्वारा पहुंच कर अथवा काटकर शरीर को रोगी करते हैं। यज्ञ द्वारा कर्मी विनाशक औषधियों की आहुति देकर इस रोग कृमियों को विनष्ट कर रोगों से बचा जा सकता है। अग्नि में डाली हुई हवि रोगों को उसी प्रकार दूर बहा ले जाती है। जिस प्रकार नदी पानी के झागों को बहा ले जाती है। यज्ञ धूम से मकानों के अंधकार पूर्ण कोनों में संदूक के पीछे पाइप आदि सामानों के पीछे, दीवारों की दरारों में तथा गुप्त स्थानों में जो रोग कर्मी बैठे रहते है वे कर्मी औषधियों के यज्ञीय धूम से विनष्ट हो जाते है। दूध, पानी जाल वायु आदि के माध्यम से शरीर के अन्दर पहुंचे हुए रोग कर्मी भी नष्ट होकर शरीर को स्वस्थ बनाते है। यज्ञीय हवि द्वारा रोगी के अन्दर प्राण फूंका जाता है। रोगों को दूर किया जाता है। उसे दीर्घ आयु प्रदान की जाती सकती है।
यज्ञ द्वारा रोग निवारण की प्रक्रिया यज्ञ से औषधी युक्त सामग्री और गौ घृत की आहुति से रोग निवारण गंध वायु मंडल में फैल जाती है। वह श्वास द्वारा फैफड़ों में भरते है। उस वायु का रक्त से सीधा सम्पर्क होता है। रोग निवारक परमाणुओं को वह वायु रक्त में पहुंचा देता है। रक्त में विद्यमान रोग कर्मी मर जाते है। रक्त के अनेक दोष वायु में आ जाते हैं प्राणायाम द्वारा वायु को बाहर निकालते है तब उसके साथ वे दोष भी हमारे शरीर से बाहर निकल जाते है। इस प्रकार यज्ञ द्वारा संस्कृत वायु में बार-बार श्वास लेने शैने: शैने: रोगी स्वस्थ हो जाता है।
भस्म को पुष्पों फलों अन्नों की फसलों में कीटनाशक के रूप में बुरक कर लाभ उठाया जा सकता है।
रोगी को कोई पौष्टिक पदार्थ खिलाने से हानि का भय रहता है किन्तु उस पौष्टिक पदार्थ क होम कर उसका सार तत्व टोगी को श्वास द्वारा खिलाया जा सकता है। संसार कि कोई पैथी इस प्रकार का कार्य नहीं कर सकती है। जो औषधी खाने से शरीर के अन्दर प्रविष्ट होकर रोग नष्ट करती है वही यज्ञ के माध्यम से घृत के परमाणुओं से प्रयुक्त होकर सूक्ष्म गैस बनकर श्वास के साथ शरीर में प्रविष्ट होकर इंजेक्शन की भांति तत्काल सीधी रक्त में मिलकर रोग को नष्ट करती है तथा फलदायक होती है अत: यज्ञ द्वारा चिकित्सा की विधि सर्वोतम है। आयुर्वेद के विभिन्न ग्रंथों के प्रयोग से जो अग्नि में औषधी डालकर धूनी से ठीक होते है वह भी यज्ञ चिकित्सा का रूप है।
नीम के पत्ते, वच, कूठ, हरण, सफेद सरसों, गूगल के चूर्ण को घी में मिलाकर धूप दें इससे विषमज्वर नष्ट हो जाता है।
नीम के पत्ते, वच, हिंग, सैंधानमक, सरसों, समभाग घी में मिलाकर धूप दें उससे व्रण के कर्मी खाज पीव नष्ट होते है।
मकोय के एक फल को घृत लगाकर आग पर डालें उसकी धूनी से आँख से कर्मी निकलकर रोग नष्ट हो जाते है। अगर, कपूर, लोवान, तगर, सुगन्धवाला, चन्दन, राल इनकी धूप देने से दाह शांत होती है।
अर्जुन के फूल बायविडंग, कलियारी की जड़, भिलावा, खस, धूप सरल, राल, चन्दन, कूठ समान मात्रा में बारीक कुटें इसके धूम से कर्मी नष्ट होते है। खटमल तथा सिर के जुएं भी नष्ट हो जाते है।
सहजने के पत्तों के रस को ताम्र पात्र में डालकर तांबे की मूसली से घोंटें घी मिलाकर धूप दें। इससे आँखों की पीड़ा अश्रुस्राव आंखो का किरकिराहट व शोथ दूर होता है।
असगन्ध निर्गुन्डी बड़ी कटेरी, पीपल के धूम से अर्श (बवासीर) की पीड़ा शांत होती है।
महामारी प्लेग में भी यज्ञ से आरोग्य लाभ होता है।
हवन गैस ँं६ंल्ल ॠं२ से रोग के कीटाणु नष्ट होते है। जो नित्य हवन करते हैं उनके शरीर व आसपास में ऐसे रोग उत्पन्न ही नहीं होते जिनमें किसी भीतरी स्थान से पीव हो। यदि कहीं उत्पन्न हो गया हो तो वह मवाद हवन गैस से शीघ्र सुख जाता है और घाव अच्छा हो जाता है।
हवन में शक्कर जलने से हे फीवर नहीं होता।
हवन में मुनक्का जलने से टाइफाइड फीवर के कीटाणु नष्ट हो जाते है।
पुष्टिकारक वस्तुएं जलने से मिष्ठ के अणु वायु में फैल कर अनेक रोगों को दूर कर पुष्टि भी प्रदान करते है।
यज्ञ सौरभ महौषधि है। यज्ञ में बैठने से ह्रदय रोगी को लाभ मिलता है। गिलोय के प्रयोग से हवन करने से कैंसर के रोगी को लाभ होने के उदहारण भी मिलते है।
गूगल के गन्ध से मनुष्य को आक्रोश नहीं घेरता और रोग पीड़ित नहीं करते ।
गूगल, गिलोय, तुलसी के पत्ते, अतीस, जायफल, चिरायते के फल सामग्री में मिलाकर यज्ञ करने से मलेरिया ज्वर दूर होता है।
गूगल, पुराना गुड, केशर, कपूर, शीतलचीनी, बड़ी इलायची, सौंठ, पीपल, शालपर्णी पृष्ठपर्णी मिलाकर यज्ञ करने से संग्रहणी दूर होती है।
चर्म रोगों में सामग्री में चिरायता गूगल कपूर, सोमलता, रेणुका, भारंगी के बीज, कौंच के बीज, जटामांसी, सुगंध कोकिला, हाउवेर, नागरमौथा, लौंग डालने से लाभ होता है।
जलती हुई खांड के धुंए में वायु शुद्ध करने की बड़ी शक्ति होती है। इससे हैजा, क्षय, चेचक आदि के विष शीघ्र नष्ट हो जाते है।
डा. हैफकिन फ्रÞांस के मतानुसार घी जलने से चेचक के कीटाणु मर जाते है।
मद्रास में प्लेग के समय डा. किंग आई एम. एस. ने कहा था घी और केशर के हवन से इस महामारी का नाश हो सकता है।
शंख वृक्षों के पुष्पों से हवन करने पर कुष्ठ रोग दूर हो जाते है।
अपामार्ग के बीजों से हवन करने पर अपस्मार (मिर्गी) रोग दूर होते है।
ज्वर दूर करने के लिए आम के पत्ते से हवन करें।
वृष्टि लाने के लिए बेंत की समिधाओं और उसके पत्रों से हवन करें।
वृष्टि रोकने के लिए दूध और लवण से हवन करें।
ऋतू परिवर्तन पर होने वाली बहुत सी बीमारियां सर्दी जुकाम मलेरिया चेचक आदि रोगों को यज्ञ से ठीक किया जा सकता है।

 

Share this News:

Author

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *