Dr Rajiv Kapila

अर्श (पाइल्स)व भगन्दर (फिस्टुला) यानि बवासीर
अर्श
विबंध के कारण अतिप्रवाहण से गुदामार्गगद रक्तवाहिनियां फूल जाती हैं जिसके कारण अर्श की उत्पत्ति होती है, इसे पाइल्स भी कहा जाता है। शोथयुक्त रक्त-वाहिनियों के कारण गुदप्रदेश की गुदानलियों में तनाव एवं पीड़ा होती है। इसी प्रकार भगन्दर यानि फिस्टुला एक असामान्य नाली के समान संरचना है जो दो आंतरिक अंगों अथवा आंतरिक अंग एवं त्वचा पर खुलने वाली गुहिका के बीच बन जाती है। भगन्दर शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है इसी लिए गुदाप्रदेश में होने वाले भगन्दर को फिस्टुला इन एनो भी कहते हैं। दूसरे शब्दों में होमोरोइड या अर्श गुदा-नाल में वाहिकाओं की वे संरचनाएं हैं जो मल नियंत्रण में सहायता करती हैं। जब वे सूज जाती हैं या बड़ी हो जाती हैं तो वे रोगजनक या बवासीर हो जाती हैं। अपनी शारीरिक अवस्था में वे धमनीय-शिरापरक वाहिका और संयोजी ऊतक द्वारा बने कुशन के रूप में काम करते हैं।
बवासीर दो प्रकार की होती है – खूनी बवासीर और बादी वाली बवासीर। खूनी बवासीर में मस्से खूनी सुर्ख होते है और उनसे खून गिरता है जबकि बादी वाली बवासीर में मस्से काले रंग के होते है और मस्सों में खाज पीड़ा और सूजन होती है। अतिसार, संग्रहणी और बवासीर यह एक दूसरे को पैदा करने वाले होते है।
मनुष्य की गुदा में तीन आवृत या बलियां होती हैं जिन्हें प्रवाहिणी, विसर्जनी व संवरणी कहते हैं जिनमें ही अर्श या बवासीर के मस्से होते हैं आम भाषा में बवासीर को दो नाम दिये गए है बादी बवासीर और खूनी बवासीर। बादी बवासीर में गुदा में सूजन, दर्द व मस्सों का फूलना आदि लक्षण होते हैं कभी-कभी मल की रगड़ खाने से एकाध बूंद खून की भी आ जाती है। लेकिन खूनी बवासीर में बाहर कुछ भी दिखाई नहीं देता लेकिन पाखाना जाते समय बहुत वेदना होती है और खून भी बहुत गिरता है जिसके कारण रकाल्पता होकर रोगी कमजोरी महसूस करता है। रोगजनक अर्श के लक्षण उपस्थित प्रकार पर निर्भर करते हैं। आंतरिक अर्श में आम तौर पर दर्द-रहित गुदा रक्तस्राव होता है जबकि वाह्य अर्श कुछ लक्षण पैदा कर सकता है या यदि थ्रोम्बोस्ड (रक्त का थक्का बनना) हो तो गुदा क्षेत्र में काफी दर्द व सूजन होता है। बहुत से लोग गुदा-मलाशय क्षेत्र के आसपास होने वाले किसी लक्षण को गलत रूप से बवासीर कह देते हैं जबकि लक्षणों के गंभीर कारणों को खारिज किया जाना चाहिए। हालांकि बवासीर के स्टीक कारण अज्ञात हैं, फिर भी कई सारे ऐसे कारक हैं जो अंतर-उदर दबाव को बढ़ावा देते हैं- विशेष रूप से कब्ज और जिनको इसके विकास में एक भूमिका निभाते पाया जाता है।
अर्श व भगन्दर के लक्षण
-खाए गए आहार के आन्त्र में ही रूके रहने के कारण आन्त्रकूजन होना, कार्श्य व उद्गार बाहुल्य, गुद प्रदेश द्वारा रक्त प्रवृत्ति, गुद प्रदेश में शूल व दाह, विबंध, अपानवायु अवरोध व क्षधा ह्रास, रक्ताल्पता, श्वास, दौर्बल्य तथा कार्श्य आदि।
आयुर्वेद उपचार
अर्श-भगन्दर के रोगी के आयुर्वेद उपचार में शौच-निवृत्ति के पश्चात गुद प्रदेश को औषधीय जल अथवा कोष्ण जल से साफ करना चाहिए। ऐसे आहार एवं औषध का प्रयोग जो अनुमोलक हों एवं जठराग्नि को बढ़ाना चाहिए। तक्र का प्रयोग, तुम्बरू, विडंग, देवदारू, यव एवं घृत के द्वारा गुद प्रदेश का धूपन फायदेमंद साबित हो सकते हैं।
इसके उपचार के तहत प्रमुख योग में कांकायन वटी, अर्शकुठार रस, त्रिफला चूर्ण, तक्रारिष्ट, कुटजारिष्ट, भल्लातक वटी और काकायन गुटिका आदि विशेषकर लाभकारी होते हैं।
स्थानीय प्रयोग में जात्यादि तैल, कासीसादि तैल और शतघौत घृत आदि का प्रयोग करना चाहिए। द्रोणी स्नान में उष्ण जल अथवा पंचवल्कल क्वाथ, फिटकरी युक्त त्रिफला या हरिद्रा क्वाथ के द्वारा करना चाहिए।
बाद की अवस्था में
1. क्षारसूत्र: औषधीय सूत्र का प्रयोग
अर्श व भगंदर में लाभदायक कतिपय औषधीय पौधे व औषधियोग में मंजिष्ठा, हरिद्रा, चित्रक, अपामार्ग, हरीतकी, कुटज, सूरण, अभयारिष्ट और द्राक्षासव हैं।
क्या करें?
इसके रोगी को उष्ण, गुरु, मसालेदार एवं लवण द्रव्यों का सेवन नहीं करना चाहिए। इनके अलावा रेशेदार भोजन का प्रयोग करना चाहिए, रात्रि में सोते समय 3 ग्राम त्रिफला चूर्ण गुनगुने जल के साथ लेना चाहिए, समय पर शौच निवृत्ति, नित्य व्यायाम यथा टहलना, दौड़ना, तैरना, हरी पत्तेदार सब्जियों, तक्र, अंगूर, अंजीर, अमरूद, अनार व सरलता से पचने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन तथा गूद प्रदेश को स्वच्छ रखना चाहिए।
क्या न करें?
इस रोग के रोगी को शौच निवृत्ति के समय प्रवाहण यानि जोर नहीं लगाना चाहिए, इसी प्रकार विरुद्ध एवं गुरु आहार, मिर्च, मसाले व मांसाहार नहीं लेना चाहिए। उन्हें कब्ज से बचना चाहिए,अधिक समय तक लगातार बैठना नहीं चाहिए, प्राकृति वेगों का धारण करना चाहिए।

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cdadmin

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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