डॉ. भुपेंद्र शर्मा, चंडीगढ़:तीन बड़े हिंदी भाषी राज्यों- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में करारी हार ने जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी की आलाकमान की रातों की नींदें उड़ा दी हैं तो वहीं अब पार्टी हाई कमान के चुनावी प्रबंधन पर उठने वाले सवाल, पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में बदलाव के संकेत देते नजर आ रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को इस शिकस्त की नैतिक जिम्मेदारी लेने की बातें करने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि ‘नेतृत्व’ को ‘हार और विफलताओं’ की भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। साफगोई के लिये चर्चित भाजपा नेता ने कहा कि सफलता की तरह कोई विफलता की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता। ‘सफलता के कई दावेदार होते हैं लेकिन विफलता में कोई साथ नहीं होता। सफलता का श्रेय लेने के लिये लोगों में होड़ रहती है लेकिन विफलता को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता, सब दूसरे की तरफ उंगली दिखाने लगते हैं।’ गडकरी ने कहा कि राजनीति में जब भी हार होती है तब कमेटी बैठती है लेकिन जब जीत मिलती है तो कोई पूछने वाला नहीं होता है क्योंकि जीत के सभी हकदार होते हैं, हार की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं होता। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीति में विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद प्रत्याशी मिलने पर बहाना बनाते हैं कि पोस्टर नहीं मिला, पार्टी से पैसा मांग रहा था तो नहीं दिया। बड़े नेता की सभा मांगी थी तो वो भी नहीं हुई, कैंसिल कर दी। इस प्रकार सारा वातावरण खराब कर दिया और इन सब कारणों की वजह से हार हुई है। गडकरी कहते हैं कि ‘मैं ऐसे नेताओं से कहता हूं कि आप चुनाव हारे क्योंकि इसमें पक्ष और आप खुद लोगों का विश्वास पाने में पीछे रह गए और इसीलिए आपकी हार हुई। इसलिए अपनी हार की जिम्मेदारी खुद लो दूसरो पर जिम्मेदारी मत डालो.’ उन्होंने कहा कि हार का क्रेडिट लेने की हिम्मत नेतृत्व में होनी चाहिए और जब तक नेतृत्व हार का क्रेडिट खुद के कंधों पर नहीं लेगा तब तक संस्था के प्रति उनकी लॉयल्टी और कटिबद्धता सिद्ध नहीं होगी।
याद रहे यह वर्ष 2014 में जब भाजपा सत्ता में आई थी तब से अब तक यह पहला मौका है जब पार्टी के किसी शीर्ष के नेता ने,जो केंद्रीय मंत्री भी हैं भाजपा आलाकमान के खिलाफ बोलने का साहस दिखाया है अलबत्ता अब तक तो भाजपा में मोदी गुनगान ही चलता आया है।
दूसरी ओर इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय जनता पार्टी की वास्तविक ताकत हिंदी भाषीय राज्य ही हैं। भाजपा को हिंदी प्रदेशों की पार्टी भी कहा जाता है। हाल के वर्षों में हालांकि भाजपा ने अपना विस्तार दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में करने का सफल प्रयास किया है मगर इन से लोक सभा चुनावों में संपूर्ण सत्ता नहीं मिल सकती। भाजपा को केंद्र की सत्ता में लाने में हिंदी प्रदेश ही बड़ी भूमिका निभाते आए हैं। पिछले वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था और अकेले ही नर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों में इन तीन बड़े राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से लोकसभा की कुल 65 सीटों में से 62 सीटों पर कब्जा जमा लिया था। इसी प्रकार यूपी में लोकसभा की 80 सीटों में से भाजपा के खाते में 71 सीटें गईं। भगवा पार्टी को 282 के आंकड़े तक पहुंचाने में हिंदी भाषी राज्यों की जनता ने मदद की थी। हिंदी प्रदेश भाजपा के मजबूत किले हैं गर इन किलों में कोई दरार आती है या धराशई होता है, जैसे अब तीन राज्य हो गये हैं, तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के मिशन 2019 के अभियान को स्थाई ‘ग्रहण’ लग सकता है।
जहां एक ओर तीन राज्यों में शिकस्त भाजपा के लिए चिंता का विषय है तो वहीं दूसरी ओर यही जीत कांग्रेस के लिए न केवल आॅकसीजन का काम कर रही है, बल्कि यह मन से हार चुके कांग्रेसियों के लिए भी मनोबल बढ़ाने वाली बात है। कांग्रेसी इस जीत का सेहरा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी पर बांध रहे हैं। याद रहे वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी लगातार विधानसभा चुनाव हार रही थी। भाजपा एक तरफ अपने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के अभियान पर बढ़ती जा रही थी। तो देश की सबसे पुरानी पार्टी के हाथ से एक-एक कर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, असम, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर के कई राज्य निकलते गए। कांग्रेस के सामने एक दौर ऐसा भी आया जब वह केवल हार रही थी। पार्टी को समझ में नहीं आ रहा था कि वह नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का मुकाबला करे या फिर अपनी पार्टी के संगठन को एकत्रित करके और मजबूती प्रदान करे। हार और निराशा की गर्त से पार्टी को उबारना राहुल के लिए बहुत बड़ी चुुनौती थी। उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की और हारने वाली कांग्रेस पार्टी को जीतने वाली पार्टी बना कर आगे बढ़ाया। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की बंपर जीत ने कांग्रेस और उसके कार्यकतार्ओं में जिस उत्साह, जोश और उमंग का संचार किया है वह वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए बेहद अहम है। भाजपा को टक्कर देने में कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों के मन में जो डर और संदेह था उसे इन चुनाव परिणामों ने दूर कर दिया है। कांग्रेस पार्टी अब बिना चेहरे के भी चुनाव जीत सकती है और मुद्दों के आधार पर वह जनता के बीच अपना जनाधार का विस्तार कर सकती है। यह जीत विपक्षी दलों को एकजुट करने का काम करेगी और भविष्य में बनने वाला विपक्ष के गठबंधन के केंद्र में कांग्रेस होगी।
राजस्थान,छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों में मिली इस शिकस्त से उभरी चिंता को लेकर भाजपा के मुकाबले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ खासा गंभीर नजर आ रहा है। इसके कुछ बड़े नेता आॅफ द रिकार्ड यह मानने लगे हैं कि लोकसभा चुनाव 2019 बीजेपी के लिए आसान डगर नहीं नजर आती। जिस प्रकार से कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन किया है गर यही प्रदर्शन लोकसभा में भी जारी रहा तो भाजपा की हार यकीनन है। उन्हें लगने लगा है कि डीमोनेटाइजेशन, जी.एस.टी., महिला सशक्तिकरण और राम मंदिर जिन मुद्दों को भाजपा भुनाना चाहती थी वे उल्ट ही पड़ते नजर आ रहे हैं। अब वक्त है पार्टी के प्रबंधन और नीतियों में बड़े बदलाव का गर यह समय रहते नही किया गया तो पार्टी के हाथों वर्ष 2019 के लोक सभा चुनाव भी निकल सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अब चाहता है कि जल्द से जल्द भारतीय जनता पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर कुछ बदलाव किये जायें ताकि भाजपा के कार्यकर्ताओं में भी नया जोश फूंका जा सके। महाराष्ट्र में एक सरकारी संस्थान के प्रमुख ने तो आरएसएस को एक चिट्ठी लिखकर यह मांग भी की है कि अगर बीजेपी को 2019 लोकसभा चुनाव में जीतना है तो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को पार्टी का नेतृत्व करने की इजाजत दी जाए। इस में कोई दो राय नहीं कि संघ अब नितिन गडकरी, राम माधव, संजय जोशी और भैया जी जैसे नेताओं को एक बार फिर से बड़ी जिम्मेदारी देता हुआ नजर आ सकता है, एक बार फिर वापस से राजनाथ सिंह और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे सीनियर नेता फ्रंट फुट पर आकर भाजपा के लिए प्रचार करते हुए नजर आ सकते हैं।
हालांकि भाजपा के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इससे इत्तेफाक नहीं रखते उनका कहना है कि लोकसभा चुनावों पर इन चुनावों का कोई भी असर नहीं पड़ने वाला। उनके मुताबिक विधानसभा और लोक सभा चुनावों में मुद्दे अलग अलग होते हैं जबकि वास्तविकता तो यही है कि भारतीय जनता पार्टी देश में हर चुनाव अपने करिशमई नेता नरेंद्र मोदी के नाम से लड़ती आई है भगवा पार्टी लोक सभा, विधान सभा और तो ओर लोकल गवर्नमेंट वाले म्युनिसिपल और पंचायती चुनाव तक नरेंद्र मोदी के कामों का बखान करके लड़ती आई है। इसी लिए विपक्ष इन चुनावों में स्थानीय भाजपा की नहीं बल्कि राष्ट्रीय भाजपा की हार बता रहा है।
दूसरी ओर स्वयं भाजपाइयों को भी अब लगने लगा है कि गर वे इसी प्रकार चुनावों में जनता की अनदेखी करते रहे तो आगामी लोक सभा चुनावी राह उनके लिए आसान नहीं होगी। भाजपा को वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस तथा इसके सहयोगी दलों जो आजकल महागठबंधन का रूप अख्तियार करते जा रहे हैं, की चुनौतियों का सामना यकीनन करना पड़ेगा। तीन बड़े हिंदी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली बंपर जीत के कई मायने हैं और इसके अलग-अलग मतलब निकाले जा सकते हैं। इस जीत से विपक्षी पार्टियों में जहां एक ओर संदेश गया है कि भाजपा अजेय पार्टी नहीं है उसे हराया जा सकता है। तो वहीं यह भी माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 के मुकाबले अब की लहर कमजोर हो गई है और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के चाणक्यई -चुनावी प्रबंधन को भी चुनौती दी सकती है बशर्ते आप इसके प्रति दृढ़संकल्प हों।
दूसरी ओर चुनाव विश्लेषक और स्वराज इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने दावा किया है कि 2019 के चुनावों में बीजेपी 100 सीटें खो सकती है। योगेंद्र यादव के मुताबिक पीएम मोदी की लोकप्रियता भी गिरी है। हालांकि उन्होंने कांग्रेस की भी आलोचना की और कहा कि पार्टी की नींद अभी तक नहीं टूटी है और आत्मतुष्टि का भाव बना हुआ है। उन्होंने मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन का हवाला देते हुए कांग्रेस को एक ‘अयोग्य पार्टी’ बताते हुये कहा कि वह एक ऐसे अवसर को हासिल करने के लिए तैयार नहीं है जो उसकी तश्तरी में आया है। उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस की निद्रा भंग नहीं हुई है। वह सो रही है। यह लापरवाही है। उन्होंने कहा कि यदि वे सोच रहे हैं कि इससे 2019 का चुनाव जीता जा सकेगा, तो वे मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं। भाजपा उदासीन नहीं है। भाजपा इस देश के लिए विनाशकारी है लेकिन वह सक्रिय है। यह अंतर है’। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह समय भाजपा के लिए विपक्षी पार्टियों पर आक्रमक होने का नहीं बल्कि आत्मचिंतन का है। उसे अपनी हार के कारणों पर गंभीरता से चिंतन-मनन करना चाहिए अन्यथा भाजपा के साथ उसी कहावत वाला हाल होना तय है-अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।

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cdadmin

Editor in Chief of City Darpan, national hindi news magazine.

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